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एक तराना अपना भी...

वक्त में बनते तरानों में एक तराना अपना भी...

कहते हैं किसी की नज़रों में जगह बनाने में काफी वक्त लगता है। पर नज़रों से गिरना क्षण भर का काम है। एक छोटी सी बात कब आपके दामन पर दाग लगा दे ये ना मैं जानता हूँ ना आप... । ये दाग भी कोई आम दाग नहीं होता जो किसी भी आम साबुन से धुल जाये ।इन्हें मिटाने के लिऐ फिर से अपने अतीत को दोहराना ( जैसे शब्दों का सामना करना ) पड़ता है। उसमें भी जगह की मंज़ूरी पर ही आप वहां के महौल का एक हिस्सा बन सकते हैं। "अगर नहीं" तो क्या? आप फिर लग जाते हैं नई जगह की तलाश में...

कभी-कभी आपकी निर्भरता भी दूसरों से कटने (अलग होने) की वजह बन जाती है । लोग परेशान हो जाते हैं दूसरों को अपने पर आश्रित पाकर । वो अलग-अलग चलन अपना कर आपको अपने में से काटना चालू कर देते हैं। तब उनकी हज़िरी भी आपके लिये विलोमता की गहराइयों में खो जाने का ज़रिया सी लगने लगती हैं, जिसमें लोग मिलकर भी (अलग होने) डगमगाने लगते हैं । और दुरिया नापते चले जाते हैं ' बहुत दूर '...

हम तो ठिकानो में ही रुके । पर मिला ना कोई।
जो रूठा है हमसे ।उससे शिकवा-गिला ना कोई ।

अक्सर बैठे-बैठे ये गाना गुनगुनाने लगता हूँ।"ये गलिया ये चौबारा, यहां आना ना दोबारा, अब हम तो भए परदेसी कि तेरा यहां कोई नहीं...” लगता है जिसे मिलना है, वो काफी दायरों में जा बसा है । जिसमें जाना मेरे लिये आग और पानी का खेल है। कभी-कभी सोचता हूँ कि जा लड़ूँ दीवारो से और मिटा दूँ उन कतरों को जो दूर हैं मुझसे या होना चाहते है, पर एकांत का मंज़र हमेशा रात के अंधेरो में चमकता रहता है। जो दूर रखता है मुझे मेरे उन साथियों से जो मिलकर भी अनदेखा कर देते हैं मेरी प्राथमिक़्ता को ।

दूर खड़ा हूँ मैं अकेला, सहारे का इन्तेज़ार है ।
हर शख़्स से लड़ा हूँ, क्या यही वक्त की मार है ।

लोग मिलते हैं और मिलकर खो जाते हैं। अपने बन कर अपने को ही छोड़ जाते हैं। जिसमें बचता अकेला ' मैं ' है जो घूमता रहता है एक अनजानी तलाश में । कितनी ही संभावनाएँ लिये यह कितने ही ठिकानों को पार कर बैठता है।

चाय की टेबल, भाप देती केतली, काँच के गिलास को धोते हाथ, एक कोने में पानी के टूटे गिलास, चार लोगों की बातें सुनती दीवारे, नेटवर्क ढूँढते मोबाइल, बैठने पर चरमराती कूर्सियाँ, अलमारी बना दी गई फ्रिज़, लोगो को रुख़सत करती दीवार घड़ी, सब वेसा ही हैं बस बदला जो हैं वो हूँ मैं, जिसमे वक्त अपना चक्र चला चुका है । जो समेटता जाता है अतीत को और रोशन करता है वर्तमान, जिसमें दोहराना अपनी जगह बनाए हुए है । जो इस दोहराने में कल था, वो आज भी है और कल भी रहेगा। पर यहाँ रहना कभी तो एकांत में खो जाता है तो कभी नई महफिलों का उत्थान कर बैठता हैं।
मनोज

सफ़र पटियाली ,

आस-पास का माहौल...


अकसर मैं अपना कुछ समय पटियाली चौराहे की चाय की दुकान पर बैठकर गुज़ारता हूँ और हमेशा की तरह वो समय रात का ही होता है 6 से 8 के बीच का जिसमे में खुद को लोगों के बीच रख पाने का समय निकाल लेता हू एसे मे तरह-तरह के लोगों से और उनके अपनी जगह को देखने के नज़रियों से मैं मुखातिब होता रहता हूँ जिससे मुझे जगह में कब, कहाँ और कैसे पैश आना है ये समझ बनती रहती है हर किसी की बात में एक नई सीख और सलाह का एतराम करना बखुबी दिमाग में बैठ जाता है और हँसने-हँसाने के साथ-साथ जगह से जुड़े किस्से और पहेलियाँ सुनने को मिलती है, एसा लगता है जैसे यहां का माहौल मुझे खुद के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा हो। चाय की दुकान का माहौल यहां के सबसे भरे हुए माहौल मे से एक है जहां तरह-तरह के लोग अपनी डेरी जमा लेते है रात के समय मे चाय की दुकान पर ही सबसे ज़्यादा रोनक देखने को मिलती है सबसे ज़्यादा रोनक का मतलब दुकान के बाहर लटका एक बेटरी से चलने वाला बल्ब जो और कही देखने को नही मिलता।


यहां रात भी तो जल्दी हो जाती है सिर्फ 7 बजे ही अंधेरा घर, गलियों, चौराहों पर अपना कब्ज़ा कर लेता है और लोग अंधेरे से चहरा छुपाए अपने-अपने घरों मे ही रहते है। जरूरत मंदो का घरों से बाहर निकलना मुनासिब है जिससे कि रात मे कोई चलता हुए दिखे तो दहशत का साया मन मे उतर आता है एसे मे या तो उलटे पैरो भागने का मन करता है या फिर अपने मन को हाथों की मुठ्ठियों मे दबाए- दुआ या राम-राम जपने का समय करीब आ जाता है।


चाय की दुकान ठीक उस जगह है जहां बसों के रुकने का ठिकाना है बस आती है रुकती है और 5 मिनट मे निकल जाती है उसके बाद घंटों का इंतज़ार क्योंकि यहां सफर की बहुत मारा-मारी है दिन में लोग यहां चलने वाली जीप गाड़ियों का सहारा लेकर अपने-अपने ठिकानों तक पहुच जाते हैं, जिसमे बहुत दिक्कत सहनी पड़ती है। यहां के अड्डे पर जीप गाड़ियां नम्बर से चलती हैं।


हर एक गाड़ी का नम्बर आता है और हर नम्बर के लिए गाड़ी को घंटो खड़ा रहना पड़ता है और जब उनका नम्बर आता है तो वो दिन की दिहाड़ी बनाने के लिए अपनी गाड़ी फुल करके चलते हैं और फुल ही नही बल्की ‌‌‌‍‌ओवर लोड करके चलते हैं। जीप के मिताबिक उसमे ज़्यादा से ज़्यादा 8 सवारी और एक ड्राइवर बैठ सकता है लेकिन यहां की जीप में जब तक 18 से 20 सवारी चड़ नही जाती वो आगे नही बढ़ती क्योंकि यहां बैठकर सफर करने का नियम नही है यहां फंसकर, खिसककर, लटककर छतों पर चड़कर सफर करने का नियम लागू है। एसा नही है कि इस सफर से लोग सहमत हैं, यहां आए दिन खिसयाते लोग ड्राइवर पर चड़ जाते है लेकिन ड्राइवर भी अपनी लाचारी सुना कर इस बहस से कट जाता है ( भाई गाड़ी चलेगी लेकिन जब तक हिसाब नही बनेगा कैसे चलाऊ, डिज़ल के पैसे, रोड के ठेके के पैसे और अपनी दिहाड़ी जब तक नही बनेगी मैं गाड़ी चलाकर क्या करूंगा, अगर किसी को जल्दी हो रही हो तो वो उतर सकता है)


यहां सफर तय करने के लिए इंतज़ार करना बैकार है क्योंकि यही एक मात्र साधन है 15-16 कि.मि का रास्ता तय करने का। अकसर लोग किलस कर उतर जाते हैं और आती-जाती गाड़ियों को हाथ देकर रोकने की कोशिश करते हैं कोई ट्रक-टेम्पों दिख जाता है तो उस पर जैसे-तैसे चड़ने का इरादा बना लेते हैं क्योंकि यहा कोई भी गाड़ी रुकने को तैय्यार नही होती क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि ये सवारी इस ठेके की है यहां गाड़ी रोकी तो ठेके के मालिक से हातापाई तक हो सकती है।


एसे में सवारी के पास कोई और रास्ता नही बचता और घिच-पिच करती इस जीप में ही सफर करना पड़ता है। मेरे साथ ये रोज़ का किस्सा है सुबह जीप की छत पर बैठकर ओफिस पहुचना और रात को टाइम से बस को पकड़ना वरना आने का कोई साधन नही है क्योंकि रात मे कोई जीप या ट्रक-टेम्पों नही चलते। पटियाली चौक पर बसें रुकने का समय – सुबह 9 बजे लोहारी खेड़ा वाली, दोपहर 2 बजे अली गंज वाली, शाम 7.30 बजे शिवारा वाली,और रात 8.30 बजे भरगैन वाली आखरी, ये सब दिशाए पटियाली से होकर गुज़रती हैं। मुझे शाम वाली गाड़ी से निकलना होता है क्योंकि उसके बाद पटियाली में वक़्त गुज़ारना बहुत मुश्किल है सड़कों पर लोग नही दिखते, बाज़ार मे भीड़ नही दिखती, चारों तरफ बस अंधेरा और उस अंधेरे मे टिम-टिमाता चाय वाले का बेटरी बल्ब और पास खड़ी एक अन्डे आमलेट वाले की रेड़ी जो उसी बल्ब के सहारे उस अंधयारी सड़क पर खड़ा है, कोई एक-आद ग्राहक आता ही रहता है जिससे उसकी कुछ घंटे खड़े रहने की हिम्मत बनी रहती है।


जैसे ही गिनती-चुनती के लोग भी घरों की तरह रूख कर लेते है वैसे ही सिमटने का दौर शुरू हो जाता है 9 साडे 9 आखरी टाइम माना जाता है जिस वक़्त कोई भी दिखाई नही देता ना लोग और ना वो टिम-टिमाता बल्ब आखिर बैटरी भी कब तक बल्ब जलाएगी वो भी कुछ घंटो तक अंधेरे से कुछ लोगों को बचाती है उसके बाद अंधेरा उसे भी अपनी चपेट मे ले सो जाता है सब के साथ।


सबके सो जाने के बाद इलाके मे लाइट आती है ठीक रात 11 बजे गिने-चुने लोगों के घरों से टि.वी चलने की आवाज़ों से ये महसूस होता है कि ये इंतज़ार में थे खुद को बोरियत से बाहर लाने के लिए क्योंकि अंधेरा सिर्फ डर ही ही नही होता। कुछ लोग अंधेरे मे खुद को उतार लेते है और सामना करते है उस ओझलपन का जिसमे कुछ दिखाई नही देता जिसमे एक छवि दम से खड़ी होती है दोनो ही जीदार है और दोनों ही एक-दूसरे को डराने का दम रखते है जिसकी हिम्मत 11 बजे तक टिक जाए वो विजेता क्योंकि 11 बजे हर घर का एक बल्ब जरूर जलता है और हज़ारों बल्ब की रोशनी के आगे जो बचा वो सकून में।


सैफू .

ढेरो गड्डे

वो पल जो वक्त की रफतार को पकड़ने की कोशिश में उसे तेज़ कर खो बेठता है अपने अतित को। तलाश जो अपनी दिनचर्या में खुद की मैं गाथा को कही अंधियारे कमरे में ओझल करती जाती है। मगर हम फिर भी अपनी वो खुदाई खत्म नही करते इस उम्मीद मे की हो सकता है जीत जाऊ ? कही ना कही उस अनमोल खज़ाने की तलाश में लगे रहते है और ढेरो गड्डे खोदते चले जाते है अपने सफर को इतिहासिक बानाने की कोशिश में।

एसा लगता है कि एक चिरग की रोशनी दूर से सब साफ दिखाने में सब मटमेला करती जा रही है । उस में भी आँखे तलाश रही है अपनी दूरी के सफर को जो कही छोटा होने के बावज़ूद भी बहूत लम्बा लग रहा है ।

ना जाने कितनी परछाईयो को पार करना पड़ता है ।और कितनी अनदेखी अफवाऔ को मानना पड़ता है । क्योकि सफर हर बार मिलता है एक नई छवी के साथ जो उसे छिलती नोचती और पी जाती । पर पीना भी अधुरा होता क्योकि कुछ ना कुछ झुटन तो बच ही जाता है।वो ही झुटन किसी मेजिक बॉक्स की तरहा फिर भर जाता जो परोसा जाता किसी नए के सामने अपने नए स्वाद के साथ। फिर क्या ? लग जाते है इसे एतिहासिक बनाने में। सब कुछ ओखली में ड़ाल कुटने लगते है एक नए मिक्शचर की उम्मीद के लिए।

फिर भी याद आता है अपनी दुरीयो का नापा वक्त जो अपने बने ढाचो में कही छिपा हमे ही तकता रहता है। वो दिवार पर लगी घड़ी जो अपनी दूरी को नापने के लिए सब गिनती जाती है ओर अपनी धड़कन से अपने होने की मोज़ूदगी का एहसास दिलाती। और कहती कितने दिन हुए । चलो आज फिर साथ मिलकर अपनी बातो में मुझे खोने दो ।

वो चाय के खाली गिलास आज भी इसी उम्मीद में रखे दिखाई देते है कि आज तो कोई मण्डली हमारे साथ अपने सफर को बाँटे और हमारी गरमाई में इस गर्म माहोल में मिठास मिलाए। पर वो मिलना भी उसे पता है बटना ही था तभी खामोश होकर उन बिखरे दानो को बस देखने का ही काम करते। आज वो सफर मे तय हुआ वक्त धुंधला है या गायब पता नही। पर कुछ है जिसकी उम्मीद है।

पता नही क्यो हम अपनो से ही कटने लगते है। अगर पुछो तो कभी समय नही मिलता कहते है या काम में व्यस्त है कहकर अपना रास्ता नाप लेते है सफर के रास्तो में उन को धुंधला करते चले जाते है । फिर भी तैयार रहता है अपना एतिहासिक पन्ना हर किसी को सुनाने के लिये ।

कभी-कभी हम खुद को इतना ज़ाहिर कर देते है कि किसी ओर की मोज़ूदगी भी हमे फीकी सी लगती है। फिर निकलते है हम अपने सफर की तलाश में। वो ही सफर हमारे लिए एक सवाल बना रहता है। कि किस सफर को हम तलाश रहे है ? वो सफर क्या है- जो हमारी रोजर्मरा की जिन्दगी में अपने होने की छाप छोड़ जाए और आए दिन अपने होने को हमारे लफ़्जो के साथ हमारे अपनो में बोंते
मनोज

इश्तिहार


इश्तहारों की भीड़ में छपा मैं भी कई जगह
किसी ने सुबह देखा, किसी ने शाम
देखने वालों में बड़बड़ाया गया, दोहराया गया
नज़र अंदाज़ भी किया गया

जगह की छाप ने मुझे दिखाया हर जगह
खबरों की आड़ में, पेपर की ताड़ में लगे चहरों ने
मुझे सुनाया हर जगह।

मैं बोलने लगा, मैं बिकने लगा
मुझे खरीदा गया हर जगह
न देखी किसी ने शाम, न देखी सुबह
मुझे मुद्दा बनाकर बताया गया जगह-जगह

वो परेशान थे, वो नादान थे
लेकिन मुझे क्यूं गप्पेबाज़ी का ज़रिया बनाया गया हर जगह
रात का होता अंधेरा अकेला कर देता है मुझे
लेकिन अंधेरों में भी चिपकाया गया मुझे कई जगह

हादसो के शहर में गुम हो जाता है कोई जब
ढ़िंढ़ोरा मचाने वालों की भीड़ लगती है तब
मन-घड़त कहानियों में उतारा जाता है कोई
मैं मन ही मन कहता हूं लोगों से
क्यों भीड़ लगाते हो जगह-जगह


सैफू.

कोई रिवाज़ नहीं था, बस यूहीं...

हमेशा से जगह अपने अंदर कई बातें, कई किस्से छुपाए बैठी होती है। अलग ज़ुबान और अलग अलग किस्से-कहानियाँ बदलती पीढ़ी में भी बातों और यादों के ज़रिये अपना सफर बरकरार रखती हैं। लोगों का दोहराना और बातों-बातों में बातों का फिसल जाना चलता रहता है जिससे कई महफिलें और मजमे अपने आपको रोज़ना की दौड़ में जमा पाते हैं। एसे ही बातों-बातों में पुरानी दिल्ली के भी कई किस्से तरह-तरह की ज़ुबानों और उम्र के साथ सामने आए कुछ सुनने में इतने रोमांचक लगते कि मानों बस सुनते ही जाओ तो कुछ उम्र दराज़ आवाज़ में दम-खम के साथ पेश आते हैं।
जामा मस्जिद चौक का ख़म्बा...
हम उसे पुराने दोर का खम्बा भी बोल सकते है।

कई साल पहले जामा मस्जिद चौक पर एक बड़ा सा ख़म्बा हुआ करता था जो इस समय हमारे साथ नही रहा। सुनने में आया है कि उसे सड़क बनाते वक़्त हटा दिया गया था क्योंकि वो सड़क को चौड़ा करने के काम मे आड़े आ रहा था। हमारा मानना था कि उस ख़म्बे के बारे में कोई बुजुर्ग ही हमें अच्छा किस्सा सुना सकते हैं क्योंकि समय के साथ जी चुके लोग समय को उसी रंग में दिखाते हैं जो उसका रंग था। लेकिन जब कई रंग की कहानियों से किसी पन्ने को रचा जाता है तो उसे हम रंगीन कहते है जो देखने में बहुत अच्छा लगता है और उसी रंगीन पन्ने की तलाश में हम पहुचे चितली क़बर चौक जहां रोज़ रात कुछ बुजुर्ग बाज़ार की दुकान बन्द होने के बाद उसके तख़्त पर अपनी पुरानी यारी-दोस्ती के किस्सों से, कुछ आज से कुछ कल से वहां महफिल सजाते है। मिलने की सोच थी कि अगर हम उनसे ख़म्बे के साथ जुड़े लम्हों के बारे में पूछें तो कई तरह की कहानियाँ- यादें और घटनाए सामने आएंगी।

ये सब बुजुर्ग आस-पास से इकठ्ठा होकर इस जगह में मिलते है सब एक-दो साल कि छोट-बड़ाई से एक-दूसरे के साथ रहते आए है जिनमें से कुछ जान-पहचान के हैं तो कुछ अंजान लोग, आते-जाते इनसे दुआ-सलाम का सिलसिला तो सालों से चला आ रहा है पर कुछ नए सिलसिलों की शुरूआत इस बार हुई है।

लगभग सभी सफेद कुर्ते-पेजामें की पोशाक में है जिसमें टोपी भी शामिल है। इनका आपसी तालमेल बहुत ही शांत तरीके से माहौल में दिखाई देता है जिसमे से शौर और हा-हा-ही-ही कहीं से कहीं तक दिखाई नहीं देता, पास जाने पर सबके चहरों पर खिलखिलाहट जरूर दिखती है। इनके बीच शामिल होने के लिए न जाने क्यों किसी तैयारी की कमी महसूस हो रही थी पास जाने पर समझ आ गया था कि तैयारी बस अपने रवइयें की करनी थी। क्योंकि जब कोई न-पसंद हो जाता है तो उसका उनके बीच में रहना न-मुमकिन हो जाता है।

हम – अस्सलामु अलेयकुम.....
( सलाम ही महफिल में आपको इज़्ज़त देता है, आपके सलाम के जवाब के साथ )
वालेयकुम अस्सलाम- सबकी आवाज़ में जवाब हल्की सी गूज़ बनकर सुनाई दिया।
दुआ-सलाम के बाद हमने उनसे कुछ पूछने की इजाज़त मांगी तो जवाब "पूछो-पूछो" में मिला।

मैं – आपसे कुछ बात करना चाह रहे थे, ( किसी एक चहरे की तहफ देखते हुए )
अब्बा जामा मस्जिद चौक पर पहले एक ख़म्बा हुआ करता था उसके बारे में जानना था कि वो कब से कब तक था और लोग उसके साथ कैसे जिया करते थे?
"हम उनकी सुनाई हर एक बात को बड़े ही एहतियात से सुन रहे थे"
अब्बा - हां था। और वो अब का थोड़ी न था, हम खुद उसे अपने बचपन से देखते आए थे।
मैं - कैसा दिखता था वो ख़म्बा ?
अब्बा - अरे वो बहुत काला था चौड़ा और लम्बा भी था उसके निचे गोल चबूतरा बना हुआ था जिस पर हम भी जाकर बैठ लिया करते थे।

अब्बा काफी बुजुर्ग थे इसलिए उन्हें अब्बा कहना अच्छा लग रहा था और उनकी बातों से लग भी रहा था कि वो बहुत कुछ बता सकते है, अब्बा की आवाज़ में ज़रा सी भी झिझक नहीं थी किसी भी बात को बताने में।
मैं - हां हम उसी के बारे में बात करना चाह रहे हैं कि लोग उस खम्बे को अपनी ज़िंदगी में कैसे जिया करते थे?

अब्बा सबकी तरफ देखते हुए बोले- सबकी तो नहीं पता पर हां उसका अपना बस एक ही किस्सा है जो हम सबकी जिंदगी से जुड़ा है जितने भी हम बैठे हैं तुम्हें छोड़कर।
यहां के किसी भी बुजुर्ग से पूछ लेना कि जब तुम्हारी शादी हुई थी तो बारात कहां से घूमाकर लाए थे... किसी पुराने आदमी से ही पूछना जो जामा मस्जिद इलाके का हो हमारी तरह।
"अब्बा का खुद के साथ, साथ बैठे सभी को पुराना कहने पर सब हसने लगे... एक-दूसरे की तरफ हँसी की दावत देते चहरे हमें भी हँसी के कुछ पल दे गए अपने बीच।"

मैं - बारात घुमा कर लाने का क्या रिवाज़ था ?
अब्बा - कोई रिवाज़ नहीं था, बस यूहीं...
मैं - यूहीं मतलब ?

अब्बा - हम कितनों की ही शादियों में नाचे, कुछ अपने, कुछ अंजान पर सबकी एक दिशा हुआ करती थी बाज़ार से होकर जामा मस्जिद के ख़म्बे तक फिर ख़म्बा घूमकर बाज़ार से होते हुए वापस घर। सबके साथ इतना सोचा नहीं था कि ये क्या रिवाज़ है? पर जब खुद की शादी पर बराती खम्बे की ओर चलने लगे तो चलने से पहले मैंने अपनी अम्मी से पूछा- अम्मी ख़म्बे तक क्यू जा रहें है हम? हमे तो बस पास मैं ही जाना है, कोई रिवाज़ है क्या ? तो अम्मी ने कहा- अरे बस यूहीं।
जब से मैं भी इतना ही जानता हूँ कि वहां शादियों पर लोग चक्कर बस यूहीं लगाया करते थे।

बराबर में बैठे बुजुर्ग ने भी इसमें अपनी बात जोड़नी चाही।
अंकल - चक्कर लगाना कोई जरूरी नहीं था मर्ज़ी वाली बात थी पर अगर कोई खम्बे का चक्कर नहीं लगाकर आता था तो बरातियों में से कोई न कोई पूछ ही लिया करता था- ख़म्बे का चक्कर क्यू नहीं लगाया?
कुछ बेफज़ूल की बात बता कर इस सवाल को टाल दिया करते थे तो कुछ सोचते थे लगाने में कोई हर्ज नहीं था लेकिन बात कुछ और थी। हमें तो लगता था कि जैसे ये कोई बादशाही वक़्त की रीत की तरह चल रहा था।

मैं - वैसे वो खम्बा वहां कब से था ?
अब्बा और कइ ज़ुबानों ने आगे-पीछे बोलते हुए जवाब दिया- हम सभी अपने बचपन से उसे देखते आए है और शायद वो पुराने वक़्त से ही है।
अब्बा - पहले उसके पास से होकर ट्रैन गुज़रा करती थी, चावड़ी, सदर, नई सड़क, यहां और लाल किले जैसी कई जगह से होकर वो पुरानी दिल्ली में घुमा करती थी वो जामा मस्जिद के इस ख़म्बे पर भी आकर रुकती थी पर वो अपना एक वक़्त हुआ करता था मोज-मस्ती का, घूमने-फिरने का।

अच्छा तो अब हम इजाज़त चाहते है अभी के लिए पर हम आते रहेंगे और हां अब्बा ये ट्रैन वाली बात continue रखेंगे।
ये कहते ही सब हसने लगे और माहौल में हा-हा-ही-ही की आवाज़ आज पहली बार सुनाई दी।

सैफू.

मेरा प्यार...

मनचला-मनचला बोलकर वो मुझसे मुह मोड़ लेती है,
फिर क्यों रात को फोन पर वो मुझे आई लव यू कहती है।
आवारा हूं मैं, बोलकर कभी तो वो मुझे जगहों में कोसती है,
जाने फिर क्यों रात को फोन पर वो मुझे आई लव यू कहती है।

जब गलियों मे रोककर बोलता हूँ उसे जान, जानू, सुनो तो,
तब कोई जवाब नहीं देती,
पर क्यों रात को फोन पर "जान बोलोना मुझे" वो कहती है।
तुम कितनी कोमल हो, अच्छी हो, खूबसूरत हो रोज़ कहने से झिझकता नहीं मैं,
लेकिन हर बार फोन करने के बाद ही क्यों ये बातें याद आती हैं।

कई चहरों से प्यार करता हूं मैं, रोज़ एक नया चहरा ढूढ़ता हूँ,
उसका चहरा तब सामने जाता है जब फोन पर मिस-कोल देती है।
कितना प्यार करते हो मुझसे?, ऐसे सवालों में मुझे घेरे रखती है,
क्यों वो मुझे फोन पर बचकानेपन में आई लव यू कहने पर मजबूर कर देती है।

कितनी बार सोचता हूँ कुछ खिला-पिला दूंगा तो प्यार बढ़ जऐगा,
कहीं घुमा-फिरा दूंगा तो प्यार बढ़ जाऐगा,
पर जब भी मैं गली से गुज़रते उसके कदमों मे अपने कदम मिलाता हूँ,
तो वो "कोई देख लेगा" ये कहकर गली ही बदल लेती है।
कभी खिड़की से कभी छत पर वो रोज़ मिलने आती है, इशारा फोन का बनाती है,
रात को फोन पर कहता हूँ "कहीं घूमने चलो" तो बहाना परेशानी बताती है।

दो दिन बात करो तो फोन पर बड़ा चिल्लती है, कहती है
"पता है कितनी परेशान हो गई थी मैं"
मैं बातों-बातों में कहता हूँ रिचार्ज करवा दूं क्या तुम्हारे फोन का,
तो जवाब हाँ मे बताती है।
कभी दुपट्टे में तो कभी बुरखे मे जब वो बाज़ार मे निकलती है,
उसकी नक़ाबी आँखों मे, मैं उसे पहचान लेता हूँ,
मैं उसके इतने करीब कैसे ये देखकर वो सर्रा सी जाती हैं।

मैं रात को फोन पर पूछता हूँ "अपने बारे में भी कुछ बताओ"
तो वो घर के बाद मुझसे प्यार करती है, बड़ा ही शर्माकर बताती है।
एक घंटा, दो घंटे, कई घंटे बातचीत का सिलसिला चलता रहता,
फोन थका, मैं थका क्या तुम थक गई हो, "सोना कब है?"
तो वो टाईम सुबह होने तक बताती है।

कई बार उसका हाथ पकड़ा तो वो छुड़ाकर भाग जाती है,
सीढ़ीयों पर उसे जकड़ा तो वो सिमट सी जाती है,
जब रात को उससे फोन पर पूछता हूँ "कैसा महसूस हुआ था तुम्हें?"
तो वो उसी को प्यार बताती है।
उस प्यार का क्या फाएदा जिसमे मिलन हो, एक दूसरे से मिलने वाली सर्रसराहट हो,
मेरी इस बात पर जाने क्यों बैशर्म हूँ मैं जताती है।

डरती है मिलने से, करीब आने से, कहती है तुम डाकू हो गांव लुट जाऐगा,
फिर सज-सवर कर क्यों निकलती हो जब गांव की फिक्र है,
तो वो दूर रहने मे ही भलाई बताती है।
पल-भर में चहरे के बदलते भावों से वो ये एहसास कराती है
"मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ"
फिर क्यों रात को फोन पर वो इन बातों को सिर्फ दिखावा बताती है।

मैं सोचता हूं कि ये मेरी सेटिंग है, वो कहती है तुम मेरे जानू हो,
मैं पूछता हूँ शादी करोगी मुझसे ?
तो क्यों वो फोन का "ऑफ बटन" दबाती है।


सैफू.

रात मे ना जाने कहां...

गली के बाहर लगे चार लड़कों के मजमे ने अपनी आपसी बातों से आस-पास को अपनी गूंज से महका रखा है, कोई उनको मस्त तो कोई उन्हें छिछोरा बड़बड़ाता हुआ निकल जाता। पर वो चारों अपनी ही मस्ती से माहौल मे वो गर्माई बनाऐ रखते जिससे बातों को सुनाने और सुनने का मज़ा बना रहता।

यहां हर गली, हर नुक्कड़ ऐसी महफिलों का भंडार लिए हुऐ है और हर एक महफिल अलग माहौल और बातें।
कहीं किसी दुकान के बाहर तो कहीं किसी बंद दुकान के चबूतरे पर तो कहीं इन चारों की तरह कही किसी गली के नुक्कड़ पर। ये सब यहीं आस-पास के यार-दोस्त हैं जो आस-पास की किसी भी बैठक पर बैठकर बातें बतियाते हैं।
जैसे किसी तख्त, खाली खड़ा रिक्शा, रेड़ी या चबूतरा। ये रोज़ नई बातें और रोज़ एक नई महफिल को अलग ढ़ंग से सजाते हैं।

कभी 4 तो कभी 6 तो कभी पूरी टोली पर आज ये चारों मस्ती भरे अंदाज़ मे एक दूसरे से मिले हैं।
ना मैं इनका नाम जानता हूं और ना ये जानता हू कि ये रहते कहां हैं ? पर इनकी आपसी बातों की गूंज ने मुझे इनकी ओर खैंच लिया
(सोचता हूं काश मेरे भी कई दोस्त होते और मैं भी इनकी तरह बने एसे मजमों में शरीक हो पाता)
ये चारों एक दूसरे से हंस-हंसकर बातें करते, कभी एक के हाथ बड़ाने पर दूसरा उसके हाथ बड़ाने को समझ उसे ताली देता तो कभी आपस मे ही एक-दूसरे तो उंगली दिखा कर हंसते।
ये इनकी आपसी समझ है जो इन्हें एक दूसरे से जोड़े रखती है, इनका रोज़ कोई नई जगह को तलाशना और मिलना कई संदर्भो मे बहा ले जाता है। एक दूसरे को जान पाना और मिज़ाज़ को समझना रोज़ नई कहानी को इनकी रोज़मर्रा से खींच लेता है।

सुबह से शाम तक की रुटीन को अपनी रात की मण्डली मे उतारना रोज़ का काम बन जाता हैं। ये चारों भी जब एक दूसरे की तरफ इशारा करके हंसते है तो मुझे इनका साथ बिताया हुआ पल दिखाई देता है। जब ये हवा मे बातें करके हंसते है तो मुझे इनसे जुड़ी कई ज़िन्दगियाँ नज़र आती हैं और जब ये हंसते-हंसते चुप्पी का माहौल साध लेते है तो मुझे इनके बीच का संवाद नज़र आता है कि ये महफिलें चीज़ो, माहौलों, शख्सों को सिर्फ़ हल्के मे ही नही गहराइ से भी लेना जानते है, जो इनकी जिंदगी में आते हैं, मिलते हैं और कुछ पल बाद सिमट कर खो जाते हैं।
मैं रोज़ अपनी गली के बाहर इन्हे कहीं खड़ा तो कही बैठा देखता हूं और ये रोज़ इसी जगह को चुनते है शायद कुछ समय के लिए उसके बाद या उससे पहले ये इस रात मे ना जाने कहां नज़रों मे आते होंगे।


सैफू.

चाय, बातचीत और रोज़

कई चलती कहानियों, बातों और किस्सो को अपने मे समेटे ये चाय की दुकाने हमसे भी हमारे रोज़ के कुछ मिनट मांग बैठती ह। इसका लुभावक तरीका और खुला मिज़ाज़ अपनी ओर खैंच लेता है। इसकी खुद की कहानी में कई जोड़ हैं जो आता है वो अपना कुछ टाईम इसमे जोड़कर इसकी डोर को और लम्बा कर देता है।

कई सालों से लोगों के बीच उसी पुराने अंदाज़ में आज भी ये दुकान उसी तरह पेश आती है जैसे बीते कल मे साथ थी। यहां आते लोग कभी-कभी कह बैठते है कि "हम यहां तब से आते है जब यहां 1 रू॰ की चाय मिला करती थी, आज 5 रू॰ की चाय है पर अब भी वैसे ही चाय पीते हैं जैसे 1 रू॰ में पिया करते थे।"
"सच बताऊ तो चाय-वाय तो बस एक बहाना है बस यहां बैठने का जो मज़ा है जो हमारी सालों की बैठक है, वो मज़ा और कहीं नही"
इनका नाम मौ॰ अय्यूब है कम से कम 45 साल के लगते हैं, इनकी बातचीत में बहुत मिठास है और इनकी मिठास की तारीफ तो दुकान के मालिक फिरोज़ भाई भी करते हैं। इनकी और अय्यूब भाई की खूब पटती है, ये सालों से इसी मिठास को अपनी आपसी बातचीत मे बरकरार रख पाऐ हैं।

अय्यूब भाई आज भी आऐ हुऐ थे हमारे आने से पहले ही वो कुर्सी पर अपने कुर्ते को उडेसे बैठे थे। हम तीन लोग सलीम, इशान और मैं रोज़ रात 10 बजे के बाद चितली क़बर चौक पर चाय पीने जाते हैं।
चितली क़बर चौक से अंदर होकर हवैली आज़म खां में ये चाय की दुकान है। अय्यूब भाई हमेशा केश-काउंटर के बराबर वाली कुर्सी पर ही बैठते है जिससे कि बातचीत का सिलसिला लगातार बना रहे।
आज भी वो वहीं बैठे थे, हम तीनों भी उस चार लोगों को समेट लेने वाली टेबल मे सिमट गऐ, अय्यूब भाई हमारे साथ और मेरे सामने वाली कुर्सी पर बैठै थे।
अय्यूब भाई : यार आज घर में बड़ी किच-पिच हो रही थी, छोटी बहू फज़ूली बात पर हंगामा मचाऐ हुऐ है, अरे ये भी कोई बात होती है?
दुकान का मालिक जिनका नाम सिराज है।
सिराज भाई : अच्छा?
उनके अच्छा बोलते ही अय्यूब भाई, सिराज भाई के कान मे कुसुर-फुसुर करने लगे।
इशान सलीम से बोला कि यार ये बताओ कि आज चाय कौन पिला रहा है?
मेरा सारा ध्यान अय्यूब भाई पर था कि यही तो थे वो जो उस दिन कह रहे थे कि मैं यहां तब से आता हूं जब यहां 1 रू॰ की चाय मिला करती थी। उनको देखकर लगा कि अय्यूब भाई का यहां से चाय का कोई रिश्ता नहीं है और ना ही जगह का कोई आकर्षण इन्हे यहां खैंचता है, इनका और भाई फिरोज़ का आपसी रिश्ता ही एक-दूसरे को बांधे हुऐ हैं और सुनने-सुनाने का ये रिश्ता सालों से महफूज़ है लेकिन सिर्फ इस जगह में।
तभी सलीम बोला भाई तू पिला रहा हे चाय?
मैं : हां बनवा लो दो बटा तीन पर मेरे पास सिर्फ़ 7 रू॰ हैं, 3 रू॰ कोई ओर देना।

दुकान ज्यादा बड़ी नही है, चार टेबल और एक टेबल पर चार लोग, मतलब 16 शख्स एक साथ इस महफिल मे शरीक हो सकते हैं। कोई नया डिज़ाइन नहीं है यहां वही पुरानी टेबल-कुर्सियां से सजा माहौल, वही सालों पुराना काउंटर और वही पुरानी दाना-दाना करके बनाई हुई पब्लिक।

तीन कर्मचारी...
पहला : 17-18 साल का लड़का, चाय का काउंटर संभालता है
दूसरा : 12-13 साल का बचपन, पानी के गिलास आते ही आगे रखना और चाय के झूटे गिलास रखने-उठाने का काम करता है।
तीसरा : 40 से 45 साल के उम्रदराज़ ओदे के साथ, वो हर आने वाले का स्वागत उनसे से पूछकर करते है कि
"कितनी चाय ?" वो ओर्डर लेने क काम करते है, इन्ही तीनो का एक काम और होता है बाहर की पब्लिक को संभालना जिसमे दुकान, ठिऐ, और कहीं किसी नुक्कड़ पर लगे मजमे शामिल होते हैं।

सभी कुछ एक आम चाय की दुकान की तरह है जहां लोगो का रुकना-बाहर निकलना चलता रहता है। पर फिर कही ओर जाने का मन नहीं करता। रोज़ इन्ही टेबलों पर टिकाने का मन बनाऐ हम घर से निकल पड़ते हैं।
यही सोच कर कि अपने अड्डे पर चलकर चाय पियेंगे।



सैफू.

चैलेंज

"भाई वसीम दो रुपय के सिक्के देना ।"

गैम की दुकान मे दखिल होने का यही तरीका था मेरा। यहां के वीड़ियो पार्लर में गैमों की भरमार है यहां तकरीबन 20 गैम की मशीने है जिसमें से 2 गैम एसे है जिसमें 999 तारीके के गैम खेल सकते है। पर मेरा मनपसन्द गैम एक ऐसा गैम है जिसमे दो लोग एक साथ चेलेंज कर सकते है और यही चेलेंज हमें जीतने और हारने जैसी प्रक्रिया मे रखता है ।
मुझ पर घर वालों का डंडा भी हैवी होने लगा था । रोज़ घर वालों की सुनता पर मानता अपने दिल की । रोज़-रोज़ दो-दो घंटो के लिये गायब रहता और जब घर वाले पुछते "कहा था ?"
तो बतोलेबाज़ी दे कर घुमा देता । पर डर लगता उनके होने के एहसास से जिसमे मे शामिल भी होने से कतराता था ।

एसी जगहें जिसमे कुछ करने की, कुछ सीखने की प्रक्रिया मे खोने के एहसास को लोग या समाज़ कुछ अलग बोली या नज़र से सम्बोधित करते है । पर वो समाज वो लोग दरासल में हमारे घर वाले ही होते है, जो इस समझ को बनाए बैठे हैं ।

: कि मेरा बच्चा सीखने जा भी रहा है तो गैम जिसका सीधा मतलब खेल होता है, किस के मां-बाप चाहते है कि उनका बच्चा पढ़ाई की उम्र में अपना ज्यादातर वक्त खेल मे लगाए...
लेकिन खेल ही तो है जो सबसे पहले घर वाले बच्चे को सिखाते है और बाद मे उसी से दूर भगाने की कोशिश...?
मेरा खुद से खेल को सीखना और मेरे घर वालों का किसी खेल को सीखाना दोनों किस संदर्भ मे अलग-अलग दिशाऐं देते हैं ?

सोच और गलत धारणा के साथ बच्चे कुछ सीखने के साथ-साथ कई अलग चीज़े भी सीख जाते है जिनकी उन्हे उम्मीद भी नही होती ।
पर मेरे साथ एसा नही था ! घर वाले कहते-कहते थक जाते मगर मैं बाज़ नही आता, उनके मना करने के बाद भी मैं गैम खेलने रोज़ पहुच जाता और उनके आने पर उस दुकान के किसी कौने मे छिप जाता... अब तो इतना हो गया था कि मेरे घर वाले जैसे ही आते तो गैम का मालिक( भाई वसीम )मुझे इशारे से पहले ही बता देते और कभी-कभी तो मम्मी को बाहर से ही मना कर देते कि "ऐबी तम्हारा बेटा यहां नही है ।"
अब मेरा घर से गैम और गैम से घर आना आसान हो गया था ।
जब कभी मम्मी पूछती : तू गैम मे से आया है ना ? तो मैं मना कर देता और साथ मे ये भी कहता

: भाई वसीम से पूछ लो जाकर अगर मैं झूट बोल रहा हूँ तो ?
वो मेरे ये बोलने से कभी भी वहां पुछने नही जाती थी ना जाने क्यू ?
वो मेरी बातों का यकिन था या कुछ और मुझे नही पता... पर उन्हे इतना तो मालूम था कि मै रोज़ गैम खेलने जाता हू ।
अब तो मम्मी ने भी मुझसे रोज़-रोज़ पुछना बन्द कर दिया था । पर कभी-कभी बाई-चांस पूछ लेती थी तो उनका पूछना और मेरा जा कर भी मना कर देना चालता रहता । मैं अपने गैम से खुश था इसलिए मै बतोलेबाज़ी का उस्ताद बन गया और घर वालो को घुमाता रहता अपनी बातों से ।

इस बीच मेरे गैम में काफी सुधार आ गया था और मेने गैम खेलने के काफी तरीकों को अपने ज़हन मे बिठा लिया था, मैं अपने बराबर या अपने हमउम्र लड़को का भी गैम ओवर कर दिया करता था , एक सिक्क़े मे रानी मिलाना और स्कोर बनाना मेरे दाए हाथ का खेल था। पर अब भी मैं भाई लईक से चेलेंज करने से डरता था, उनकी मोज़ूदगी में मैं अपने आप को कहीं छोटा सा महसुस करता था ।
उनके साथ ना खेलना मेरे लिए एक पहेली सा बन गया था जिसे समझ पाना मुशकिल सा लगता था। एक कोने मे खड़े होकर चुपचाप उनके गेम को देखता रहता था । यह देखना भी मुझे काफी कुछ सिखाता । इसी से मैं अनेक सीखने-सिखाने की छुआन को उस कोने मे खड़ा सीखता रहता ।

एक दिन भाई वसीम ने कह ही दिया कि : कब तक खड़ा रहेगा ? कभी तो खेलेगा ही ?
" चल सिक्का डाल ।" उन्होने यह कहकर मेरा सिक्का उस गैम मे डालवा दिया । मैं खुश नही था मुझे पता था कि मेरा सिक्का बेकार गया । यह अभी दो मिनट मे मेरा गेम ऑवर करके भागा देंगे मुझे। इनके सामने मेरा तो गेम ऑवर होना तो तय है । इन्ही को तो देख कर सिखा हु भाला केसे हरा पाऊंगा इन्है ? अब सिक्का डाल ही दिया है तो खेलना ही पड़ेगा ।
उस जगह थोड़ा चेलेंज स्वीकारा लिया मैंने और उनके साथ खेलने लगा ।

वो मेरे साथ मज़ाक से खेल रहे थे उनका उनका कहना था की मेरे तीन पिल्यरों को एक से ही मार देंगे । इसलिए वो मुझसे मज़ाक से खेल रहे थे । उनके मज़ाक के खेल से भी मैं जी-तोड़ मेहनत करके लड़ रहा था । पता नही मुझसे खेला क्यो नही जा रहा था। क्या ये सब उनका डर था या गैम ऑवर होने का ?


उनके दो पिल्यर मर गये थे और मेरा एक । उन्होने मेरा दूसरा पिल्यर भी बच्चे की तरह मार दिया । पर तीसरे पिल्यर से मैंने उनका पिल्यर मार दिया । मैं मन ही मन खुश था उस समय मैंने उनसे दूसरा सिक्का डालने को मना कर दिया ।
वो भी हसी मज़ाक करते हुऐ आपने घर चल दिये । मन ही मन मैं खुशी से भरा था की भाई लईक को घर चलता किया है मैंने। इस बात को मैं हफ्ते भर तक गाता रहा था भाई वसीम की दुकान में ।



मनोज.

"मीना बाज़ार"


पुरानी दिल्ली की छोटी-बड़ी मंडलियों को समेट कर अपनी पहचान को पक्का करती ये ठिऐ नुमा दुकान मीना बाज़ार की सीढ़ियों पर एक ऐसा माहौल तैयार करती है जिसमे एक को देख एक मस्ती मज़ाक, जोरा-जोरी, लड़ाई-झगड़े से माहौल को भारी-भरकम बनाऐ रखते है। जो देखने-सुनने, उठने-बेठने मे बड़ी ही मज़ेदार जगह लगती है,
पर ये मज़ेदारी का एहसास कहां से आता है?
क्या जिस माहौल मे हमारा उठना-बेठना नही होता वो मज़ेदार या अदभुत होता है?
या हम ही से बनी जगह का एहसास जगह को खास बना देता है?
लोगों की शिरकत और एक ऐसे टाईम में दुकान का चलना जिस टाईम में लोग ढूढ़ते है ऐसी जगहों को जिसमे बैठ रात कट जाऐ, जिसमे रात का अंधेरा मन को सकून दे।
अलग-अलग छवियों, माहौलों और बातचीत से बनाऐ रखती है ये जगह अपने आप को दूसरों से अलग।



सैफू.

चाहतों से बनी जगह

जब एक दूसरे की सांस से जगह हमेशा ज़िंदा रहने का मुकाम बना लेती है तो उस जगह का दम तोड़ना या कुछ घंटों के लिए जिंदा होने की मौज़ूदगी में रहना मुश्किल हो जाता है।
उसके बीच उस जगह को कौन उस जगह के होने की मौजूदगी में रखता है, चबूतरे के मालिक को कोई लैना देना नहीं।
अब वहां कोई रात के 2 बज़े तक चाय का ठिया लगाए या अण्डे-पराठे की रेड़ी। वहां लगने वाली भीड़ उस जगह के आकर्षण के आकार को और फैलाती रहती है।
आप यहां एक दूसरे को देखकर उसके जैसा रंग अपना सकते हो, क्योंकि वो जगह ही बनी हुई है एक दूसरे के रंग से, कोई अपना रंग लेकर आता है तो कोई अपना रंग भूल किसी और के रंग में रंग जाता है। कोई अपनी जगह में रहने की हिदायत देता नज़र आता है, तो किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता कोई कुछ भी करे उनका मानना है कि जैसा करेगा वैसा भुकतेगा।

हंसी-मज़ाक करते रहना और 5-10 रू के पीछे इन जगहों के हसीन पलों को छोड़ना कोई नहीं चाहता। पर ऐसे भी लोग हैं जो मानते हैं ये नशा है, जुआ है अपनी जिंदगी के साथ, अपने वक्त के साथ।
वो चाहते हैं कि वो समय की कदर करें और अपना समय बरबाद करने से बहतर किसी काम में लगाऐं, पर उस जगह में आ रहे लोग इन बातों से कहां प्रभावित होने वाले, वो जानते हैं तो बस...
"कुछ पल की जिंदगी है, आज है कल नहीं तो कुछ पल अपने लिए ही सही" जिसमें मैं हूँ, मेरे दोस्त हों, मेरा अंदाज़ हो, हमारी हँसी हो, एक-दूसरे का सुनना सुनाना हो, कभी सलाह मशवरा हो तो कभी-कभी बस यूंही आना हो।

पर कुछ पल हों जो अपने काम से परे हों, घर-परिवार से परे हो, करीयर की टेंशन से परे हो और उसमें हो वो जो मज़ा भी दे और खुशी भी, जिसमें बार-बार जाना कभी बोरियत न बने, बने तो बस दुबारा बार-बार जाने का नशा, रोज़ अलग मज़े का नशा।
जिसको में उस जगह के आकर्षण के रूप में देखू तो कभी ज़िद या आदत में।

यहां कौन कहां से आता है? क्या करके आता है? कब आता है? और कब तक जाता है?
ये न तो किसी को जानने की जरूरत है और न ही किसी को बताने की...
यहां बहुत कुछ अपनी मर्ज़ी पर निर्भर होता है और बहुत कुछ नहीं भी।



सैफू.

12:45 चाय की दुकान...

चार लोग दो-दो के ग्रुप में आमने-सामने बैठे हैं लकड़ी की टेबल पर। उसके ऊपर का कलर चाय वाले ने अपने पोछे के कपड़े में सोख लिया है।
पूरे भरे हुए चार गिलास पानी उनके स्वागत पर उन्हें दिये गए हैं। चारों 35 से 40 तक की उम्र तक के होंगे। सबने सर्दियों के मुताबिक गर्म कपड़े पहन रखे हैं। उनमें से एक के बाल अनुभव की रेंज में आकर पक चुके हैं। बातों का सिलसिला उनके स्वागत से पहले ही श्री गणेश हो चुका है।

पहला आदमी : (बालों का रंग सफ़ेद होने के हिसाब से सबका पंच लगा रहा है) थोड़े गम्भीर स्वर में बोला, "आज जुनेद का एक्सीडेंट हो गया।"

दूसरा आदमी : (अपनी पतली काया और काली चमड़ी के साथ)
चौंकते हुए पूछा, "कब?”

पहला आदमी : हल्के स्वार में बोला। "आज सुबह।"
(बोलने का तरीका और चहरे के भाव से लग रहा था कि जैसे किसी मछुआरे की नौका सम्रुद्र में डूब रही हो और वो बेचारा दुखी किनारे से सब देख रहा हो)

दूसरा आदमी : "वो कल ही रास्ते में मुझसे दुआ-सलाम करता जा रहा था।"
(यह उस मछुआरे को सहानुभूति देकर दुख की छाया से बाहर निकालने की कोशिश में लग रहा है।)

पहला आदमी : "ट्रक के साथ एक्सीडेंट हुआ है, बाईक पर था। अभी तो निकलवाई थी उसने। मैं तो उसे देख भी
नहीं पाया"
(मानो जैसे पूरा दृष्य उसकी आँखों के सामने फिर रिवाइन्ड हो कर आ गया हो)

टककक... चाय के गिलास टेबल पर आ गये और वो भी अपनी चिंतन से बाहर आ गये। थोड़ी देर सब शांत रहे मानों जैसे मोन व्रत हो और फिर चाय पीने लगे। माहौल पता नहीं कहाँ गुम था। मुझे समझ नहीं आ रहा था कि "मैं कहां हुँ?“



मनोज.

छत्ता लाल मिया " जिम "

ये एक लोकल जिम है जिसकी बनावट कुछ खास नहीं है। पुरानी दिल्ली में ऐसे कई जिम गलियों-चौराहों पर चलते हैं जो अपनी बनावट से ज्यादा उसमें एक्सर्साएज़ कर रहे बन्दों पर गोर करते हैं वैसे यहां के आस पास के सभी जिम 60-70 गज की लम्बाई-चौड़ाई में ही बने हुए हैं जिसमें 100 से 150 बन्दे रोज़ के आते हैं, बाकाएदा उनकी रजिस्टर में एंटरी होती है और महीना आते ही याद दिला दिया जाता है कि
"भाइ आपका महिना हो चुका है" !
जिम अकसर दो टाइमिंग में चलते हैं सुबह 6 से 11 और शाम 5 से 10, यहां लड़कों में जिम का इतना शौक़ हैं कि सुबह-शाम ये दोनों टाइम ही भरा हुआ मिलता है।

यहां का अपना ही एक माहौल होता है जो हमें बाहर की एक समझ देता है कि लोग अब लोगों को कैसा देखना चाहते हैं।
मैं अपने आप में कैसा दिखता हूं और क्या बनना चाहता हूं? ये सवाल अपने आने वाले कल को लेकर ही होता है पर सिर्फ दिखावे में जो दिखता है उसके लिए। कुछ बनने से पहले हम उस दुनियां की कल्पना में खोये रहते हैं जो हमको उस बहाव में तैरने का एहसास देता है।

दोस्तों के बीच खड़े होने का तरीका और सड़क या बाज़ार में घुमने के स्टाइल की एक हवा सी गुज़रती है दिमाग में जिसके झोके हमको जिम से बांधे रखती है। फिर ख्याल आता है कि आप उस जगह में अकेले नहीं हो वहां आप जैसे शुरूआती बहुत हैं, जो अपने से और उस जगह से एक दिलचस्पी से जुड़े हैं।

जिम की बनावट और यहां की सजावट हमको एक ऐसे आकर्षण की ओर ले जाता है जो आप चाहते हो। इसका मैन मुद्दा है अपकी चाहत को समेट कर लाना और उत्साहित करना।
फिल्मी हीरो के फोटो लगाना, सलमान खान बिना शर्ट के, जोहन इबराहम की चेस्ट, शाहरूख के सिक्स पैक, उदय चौपड़ा के डोले और बाक़ी होलीवूड की फोटो, आर-नोल्ड वगैरह...

इन सब शख्सियतों को देखने पर देखने वाले को क्या उत्सुकता मिलती है ये समझ हर जिम के पास होती है वो अच्छे से अच्छा फोटो लगाता है, क्योंकि ये सब शख्सियतें ही उसके जिम का आकर्षण हैं, इतना सब देखने और अपने साथ एक्सर्साइज़ कर रहे छोटे-बड़ों से इतना तो पता चल ही जाता है कि शुरूआत क्या है और आगे क्या होगा।

बहुत से ऐसे लोग भी मिलते हैं जो हमको इसका अन्त समझाते हैं कोई रोककर तो कोई सलाह मशवरे में। इस जगह आपसी बातचीत का एक अलग ही रोमांच है जो बाकी सब जगहों से अलग है
जिसमें हमउम्र होने की वजह से अपनी बात को कही भी रखने में कोई झिझक नहीं होती, जिसमें "धिरे से बोल"
ये लाइन कहीं खोई सी लगती है।

जिम में नए चहरों को देखकर लगता है कि इनके भी कई सपने होंगे इस जगह से जुड़ी कितनी ही उम्मीदें और बातें होंगी, जिसको पूरा करने की आस में ये या तो सफल हो जाएगें या फिर कुछ टाइम बाद एक ऐसा समय अएगा कि ये भी मेरी तरह जिम आना छोड़ कर, उसके सपनों और यादों में ही घूमते रहेगें।



सैफू.

इस बनने की शुरूआत कैसे हुई?

राहों से अपनी पसन्द की चिज़ों को चुनकर इकठ्ठा करना और अपना घर तैयार करना।
यही तरीका है केरम क्लब के बनने का जिसमें क्लब का मालिक अपनी मर्ज़ी से क्लब को किसी तैय्यारी में सजाता है।

पसन्द न पसन्द आर्कषण के मुताबिक माहौलों को देखकर तैयार करता। जहाँ माहौल टाईम-पास होने का या करने का समय नहीं देता वहाँ केरम जैसे टाईम-पास खेलों को जगह मिल जाती है। जिसमें महफिल बनती, जुड़ती, संवर कर अपना खेल पैना करती नज़र आती है। खेल को पैना करना और उस खेल को बनाए रखने की होड़ में महफिलें इन जगहों को अपनी रोज़मर्रा में जोड़ लेती है।
एक केरम क्लब अपनी लम्बाई-चौड़ाई को जब तक लोगों की मौजूदगी से भर नहीं लेता तब तक कैरम क्लब खाली सा लगता है पर जब भीड़ होती है तो जगह का मालिक अपनी बनावटी दुनिया से खुश हो जाता है।

दो कैरम बोर्डो का यह महकमा सिमटता और अपने में सबको समेटता सा लगता है।
पर सब भूल लोग अपने हुनर को दिखाने में लग जाते हैं जिसमें से अनेक परछाईयाँ अपना प्रतिबिम्ब छोड़ चली जाती हैं। जिनकी छोड़ी गई धूल हर कोने में लगी दिखती है। वो कोना उनकी याद के साथ तैयार हो कर कुछ पलों को याद करने का रुप बन जाता है।
हर किसी के पास अपने समय का चक़्कर अपने हाथ की उंगलियों पर गढ़ा है। जिसमें से हर उंगली अपनी एक प्रतिक्रिया में मशरुफ़ नज़र आती है। जिसके खाली स्पेस में केरम जेसा खेल अपना भराव बनाए हुए है।

बनने- बनाने के बीच में...

कुछ जगहें जो अपनी और दूसरों की संतुष्टि को पूर्ण करने की इच्छा ज़ाहिर करती रहती हैं। कुछ अनमोल ठिकाने जो बहुमूल्य कामों से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण लगने लगते हैं। उसी में बैठे लोग अपनी खांचेदार ज़िन्दगी को जोड़ते जाते हैं, अपनी जरुरतों, कामों और महफिलों को जमाने में इच्छुक लोग घूमते, बनाते चलते हैं अपनी मनचाही जगाहों को।
यह लोग वो होते हैं जो छाल नुमा ज़िन्दगी को जीते जाते हैं और हर वाद-अपवाद को अपने शरीर से दूर कर नई छाल की बुनाई में लग जाते हैं।

फिर शुरु होती है समुह गढ़ने की एक अनुठी प्रतिक्रिया। जिसमें अवज्ञा और अनादर को दूर हटाकर अपने बनाए कस्बों मे विलीन होने की शक्ति होती हैं। वो कस्बें जो अन्नत में खत्म होते और फिर अपने प्रतिबिन्द की तरह ही बनते जाते हैं।
इसमे प्रकाश और अंधकार दोनों ही इन कस्बों को बनाने और बिगाड़ने में निपुर्ण है।
प्रकाश जो कि महफिल की रोनक में सब दिखाता है, सच हो या झूट। पर अंधकार अपनी चपेट में सब को लेकर विलीन होने की कंगार पर नज़र आता हैं।

इसमे सर्वदा अपना पाठ लिए घूम रहा हैं, जो टाईम-टेबल के हिसाब से आपको अपनी रुटीन में घूमाता रहता है। वो नवीन इच्छाओं को गाठ-व-गाठ बांधकर एक जालीदार ढ़ांचा तैयार करता है।
उसे आप ओढ़ कुछ हदतक लोगों की छायादार वाणी से बच पाते हो। मगर आप अंजान नहीं हो, क्योंकि जालीदार ढ़ांचे की वजह से आप अपने कुल में हो रहे संवाद को परखते और जोड़ते चलते हो...


...मनोज...

" भाई ताब का कैरम क्लब "

पुरानी दिल्ली की रंग वाली गली में।

यहां लोगों के आने के कई तरीके है मतलब सबके अपने-अपने मतलब जुड़े हैं इस जगह से। यहां कोई खेलने आता है तो कोई देखने, कोई मज़ाक करने तो कोई खेल की भावना में मगन चैलेन्ज देता हुआ पर जब यहां की भीड़ अपने रंग में होती है तो पुराने खिलाड़ियों की वही मण्डलियां जो ऊच-नीच को शर्तो के बल पर तय करतीं हैं। जो कहती हैं
"है दम तो जीत के दिखा पर शर्त लगा कर" उस वक्त खेल पर खिलाड़ियों का पैसा भी लगा होता है और इज्ज़त भी, इज्ज़त तो दूसरी निकली आवाज़ से वापस भी आ सकती है पर यहां पैसों का जेब बदलना चलता रहता है। जिसमें लगता है कि यहां हर कोई अपना रुतबा तय करने की होड़ में है, ऐसे में ये देखते चहरे कि "कौन जीतेगा" बड़े उत्साहित रहते हैं कि किसने, कब, क्या गलती की और वो अगली टन आने पर क्या कर सकता है, ये वहां खड़े बाकी लोग अनुमान लगाते और कुछ-कुछ बोलते नज़र आते।
यहां शर्तों के दाम 200 से 500 तक का सफर तय कर लेते हैं सिर्फ अपने अनुभव की बहस पर। बिना बहस तो कोई यहां 100-50 की भी शर्त नही लगाता।
पर बिना शर्तों में हार-जीत का मज़ा लेते कई लोग जगह में खेल देखने और खेलने का आकर्षण बन जाते हैं शुरुआती या कभी-कबार दिखते चहरों के लिए।


...सैफू...

" रहीस रॉकेट "

हर किसी माहौल में मिलावटी दुनिया की कल्पना करना और अपने आपसी सुझावों को सुलझाने की एक क्रिया जिसकी मौजूदगी हर बार, बार-बार महसूस होती है इस जगह में। हर कोई लड़ता, भागता, सिमटता नज़र आता है। अंकुरों की फुटकान के साथ जन्म लेते हैं निर्णय जिसे पनपने की एक जगह के रूप में संजोए रखने की कोशिश करती है यह जगह। कितनी जगहों के नेटवर्क को अपनी आपसी बातों में छोड़ जाते लोग, कुछ पाते कुछ खोते लोग, कभी समाचार केंद्र बन कर उभरते, कभी बातों-बातों में मदरसे की तालीम देते, कभी आपके और समाज के बनाए नियमों से लड़ते तो कभी सब आँखें मींच कर छोड़ देते समय पर और इन्तज़ार करते समय कटने का।
क़्लब, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई लोगों के आगमन से सिमट सी गई है। दो बड़े कैरम से संजोया हुआ यह क़्लब 20 लोगों को अपने भीतर समेटने की क्षमता के साथ वहाँ अपना मुकाम जमाए खड़ा है।
रहीस नाम से जाना जाने वाला शख़्स चैम्प के ओहदे को समेट वहाँ अपनी मौज़ूदगी को रोज़मर्रा में बरकरार रख किसी के सामने खेलने बैठा है। जब उसका स्ट्राइकर गोटी से टकराता है तो गोटी रॉकेट की तरह अपना रास्ता बनाते हुए पॉकेट में चली जाती है। इसीलिए उसे रहीस रॉकेट के नाम से भी जाना जाता है।
हर मुलाक़ात में मेहमान और मेज़बान की भूमिका को निभाने की रीत छोड़ कर रहीस भाई अपने दोस्तों की मण्डली को महकाने और चमकाने का सारा बंदोबस्त अपनी दमदार आवाज़ के साथ तैयार कर इन रिश्तों की गाँठों को खोलते नज़र आते हैं। बड़ी आँखों के साथ खिलाड़ियों के जज़्बातों के साथ खेलने के अनुभव के कारण कभी तो हार जाते हैं तो कभी जीत कर बातों की लड़ियों को इकठ्ठा करके हारने वाले को जला-जला के भून डालते हैं।
ऐसी ही बातें जो बकवास या छोड़ू हैं वे इन्हें यहाँ का बकवासबाज़ी का बादशाह बनाए रखती हैं। इनका ज़ोरदार सलाम करने का अंदाज़ पूरे क़्लब का माहौल बदल देता है। ये अक्सर कुछ ऐसी बातें कहते रहते हैं जिसका किसी को पाता नहीं होता। इनका कहना है कि ये 17 साल की उम्र में दिल्ली चैम्प का ख़िताब हासिल कर चुके हैं, लेकिन इनकी छवि को देखकर तो नहीं लगता कि इन्होंने कभी चैम्प के ओहदे को स्वीकारा है पर खेल और खेल में निशानेबाज़ी इनको वहाँ का चैम्प बनाए रखती है। इनकी अदाएँ लोगों को सर फोड़ने और विवश होने पर मज़बूर कर देती हैं। लोगों का इनकी बातों को सुन हँस-हँसकर पेट में दर्द हो जाता है।
इस हल्ला-गुल्ला वाले माहौल में एक समय ऐसा भी आता है जिसमें सबकुछ शांत हो जाता है। वो मग़रिब की अज़ान का वक़्त होता है जिसमें सभी लोग चुप हो जाते हैं। गेम खेलना और पंखा बन्द कर दिया जाता है। वहाँ बैठे चहरे एक-दूसरे के चहरे के चुप होने के इंतज़ार में लगे दिखाई देते हैं।


...मनोज...

नज़रों से...

वो हमारी कालोनी में ही मंदिर के पास बने एक छोटे से कमरे में रहता है। उसका वो छोटा सा कमरा किसी इलेक्ट्रॉनिक कबाड़खाने से कम नहीं। उसने अपने कमरे में अपना एक कोना बना रखा है। चारदीवारी के बीच हर एक कोने में फैले पुराने रेडियो, घड़ियाँ, घंटे, अलार्म, कैमरे, पुराने वायर - कुछ ठीक तो कुछ ख़राब, जगह-जगह फैले खुले रेडियो के पुर्ज़े और उसके काम को अंजाम देने वाला हर वो सामान खुला पड़ा था, बिना किसी बॉक्स के।
उसकी इस चारदीवारी में कोई आलमारी नहीं है, बस एक टेबल है जो कोने में न होकर भी कोने में है। उस पर रखा था एक14 इंची टी.वी., जिसकी बंद मौजूदगी से मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि "क्या ये टी.वी. ठीक होगा?" पर बात तो उस शख़्स की है जो 5फुट4-5 इंच का होगा। आँखों में हमेशा मेहनती नमी और कपड़े ज़्यादातर डार्क कलर के, चेहरा गोल और हाथों में ग्रीस जैसा कालापन - जो ये एहसास दिलाता है कि बन्दा मेहनती है।
वही कमरा उसके रहने की जगह है और वही खाने-पकाने की भी। वही उसका कारखाना है और वही चारदीवारी उसका माल इकठ्ठा करने का गोदाम।
वो हमेशा अपने कमरे में अकेला या दुकेला बैठा नज़र आता, कुछ न कुछ करता हुआ।
उसकी उम्र तो मुझे मालूम नहीं पर होगी यही कोई 30 के आस-पास की। वो अकेला ही रहता है। पता नहीं उसके माँ-बाप इस दुनिया में हैं भी या नहीं। आज तक मैंने उसे सिर्फ़ काम करते ही देखा है। कभी-कभार खाली दिखता है तो इतना खुश दिखता है मानो उसकी कोई लॉटरी लग गई हो। कभी उससे पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि "भाई क्या हालचाल है?"
अक्सर वो बाहर नहीं दिखता। हाँ, कभी-कभी चाय पीने ज़रूर निकलता है। ऐसे में उससे मुलाक़ात होना मुश्किल सा था। पर कुछ वक़्त पहले उससे हुई एक मुलाक़ात ने मेरे कई सवालों की गुत्थी सुलझा दी, मसलन वो कितने समय से इस काम में अपने पैर जमाए हुए है? कबाड़ चुनने-खरीदने की नज़र उसने कितने समय में बनाई होगी? पुराना आलार्म कितने में खरीदता-बेचता होगा?
उसके कबाड़ को देखकर इस तरह के ढेरों सवाल मन में उठते थे पर एक सवाल का जवाब वो हर सण्डे कालोनी को देकर निकलता है कि उस कबाड़ का वो करता क्या है? दीवार घड़ियाँ, नये-पुराने रेडियो, ठीक चलती हुई हाथ घड़ियाँ, यहां तक कि वो कभी-कभी टी.वी. भी लेकर निकलता है। वो इतना सामान कबाड़ से कैसे ठीक कर लेता है?
सच में उसकी मेहनत या कहें उसके दिमाग का खेल है। वो जैसे ही एक बोरे में सारा सामान कंधे पर लादे कई गलियों से गुज़रता है, रास्ते में मिलने वाला शख़्स पूछने से नहीं चूकता-"आज कोई बढ़िया अलार्म है?”, “कोई अच्छी सी घड़ी है?”, "यार बोरा उतार, शायद कोई बढ़िया रेडियो मिल जाये?”
ऐसी लाइनों से होकर गुज़रता वो कई बार बोरे को कंधे से ऊपर -नीचे, उतारता-चढ़ाता, बाहर तक पहुँचता और किसी रिक्शे की ताक में खड़ा हो जाता।
जैसे ही कोई रिक्शा रुकता तो वो बोलता, "भाई चलना है इतवार बाज़ार"


...सैफ़ू...

माहौल और समाज

माहौल और समाज हमे हमेशा एक धुंध में रखता है जिसकी वजह से हम कभी कुछ नहीं देख पाते इसी में समय अपने आप को बदल इतिहास लिखता चला आ रहा है। वो इतिहास जो अभी के समय हमारे साथ है और बाद में किसी कागज़ के पन्ने का एक हिस्सा सा लगता है।
उसी मे बंधे लोग बाद या आने वाले इतिहास की रचना किये बिना ही फैसले लेने और समझने की एक अनमोल गाथा को लोगों को समझाते आ रहे हैं।
अपने अनुभव और अपनी समझ में बनाए एक आकार को लोगों के आगे पेश करके वो रचनात्मक तरीके से जी रहे हैं।
वो पेश करना आगे चल समाज की आवाज़ या समाज का ही एक रुप ले लोगों को अपनी बोलियों में इनकी परिभाषाएँ देता चला आ रहा है।
चाय की दुकान जिसकी हालत से मालूम होता है कि वो काफी पुरानी है पर उस पुरानेपन को सफेदी की चमक से अभी भी चम्का रखा है।

चाय की दुकान जिसमें चाय बनाने का एक बड़ा सा ठिया, जिस पर तीन बड़ी केतलियाँ जिसमें हमेशा चाय पत्ती का पानी उबलता रहता, कप और गिलास की एक लम्बी लाईन तकरीबन पन्द्रह जोड़े और बीच में एक नीली मटमेली शर्ट पहने एक ढ़ाड़ी वाला आदमी जो हमेशा ऑडर की चाय बनाकर देता।
उसी के बराबर में एक सफेद कुर्ता-पजामा पहने, सर पर टोपी लागाए हाथ में अखबार लिए कुर्सी पर बैठा आदमी जो सबके पैसे काटता है।
दो लोग और जो चाय को सर्व करने का काम करते हैं। जो तकरीबन एक बारह साल का लड़का और एक पच्चीस साल का आदमी है।


यहां लकड़ी की छ: टेबल है और बारह बेंच। हर एक टेबल पर 4 लोग आ जाते हैं। एक कोका-कोला की फ्रिज़ जो अब वक्त़ के हालात के साथ अपना रहन-सहन बदल चुकी है, जिसमें अब कप-गिलास के सेट वगैरह ही रखे जाते हैं।
उसी के बराबर में दूसरी टेबल पर बैठी एक औरत जो उस चाय की पुरानी दुकान में नई सी लग रही है। उसने नीला लाईट सुट पहन रखा है, रंग सांवला, चेहरा थोड़ा लम्बा, काली और छोटी आँखें, होटों पर सुर्ख गुलाबी रंग की लिप्सटिक, दांत गुटके खाकर पीले कर चुकी वो औरत आज समाज की नज़रों से लड़ रही है।
कोई उससे कुछ कहता नहीं पर हर कोई उसे आँखों-आँखों में नग़्न कर बैठा है।
और वो सब बातों से अन्जान न होते हुए भी अपनी चाय में मस्त है।

...मनोज...

कुछ जगहें...



चलते रास्तों पर अपना एक ठहराव लिए कुछ जगहें जो आपको रुकने-ठहरने का आमंत्रण देतीं हैं।
वो जगहें जो अच्छे-बुरे की परिभाषा को लिए आपको कुछ और समझाने की कोशिश में लगी दिखाई देतीं हैं।
कभी तो वो मंचन बन आपको ऊँचा उठा देतीं हैं तो कभी उस ऊँचाई से धक़्का भी दे सकती हैं।
जगहें जो अपने निरंतर बदलाव के साथ अपनी बदलती परिभाषाओं में आपको समेटती रहतीं हैं।
उस समेटने मे आप उस जगह के एक बदलाव मे गठित नज़र आने लगते हो।
वो गठन जो आपको एक लम्बे समय से अपकी बोलियों में आपको डराता नज़र आता था।
जगहें जो खालीपन और भराव दोनों में ही अपनी एक रोज़र्मरा को लिए जीती चली जाती हैं।
वो कभी सीखने का केन्द्र बन उभरती हैं तो कभी रिश्तों की डोर मज़बूत करती नज़र आती...
अपने बनने और दूसरों के बनने तक यह हमेशा लोगों को सींचती नज़र आती है। लोगों को रियाज़ मे
रखकर यह उनकी एक अलग छवि लोगों के सामने पेश करती हैं।
लोग उस छवि को कुछ और समझ अपने रियाज़ को पक़्का करते रहते हैं। अपनी समझ में जगहों के बीच होने वाले आदान-प्रदान की भावना को भूल वो आपसी समझ की दिवारों में घिरे रह जाते हैं। और बनाते फिरते है ऐसे माहौल जो कभी अच्छे लगते हैं तो कभी उसे बनाने वालों के लिए अच्छा और देखने वालो को लिए कुछ और ही


मनोज