Showing posts with label देखा-देखी. Show all posts
Showing posts with label देखा-देखी. Show all posts

दिल्ली में फ़ायरिंग, 'इंडियन मुजाहिदीन' की चेतावनी

घटनास्थल















भारत की राजधानी दिल्ली में अज्ञात बंदूकधारियों ने जामा मस्जिद के गेट नंबर तीन के बाहर पर्यटकों की एक बस पर गोलियाँ चलाई हैं जिसके कारण दो लोग घायल हो गए हैं. पुलिस के अनुसार सुबह लगभग साढ़े ग्यारह बजे इस इलाक़े में फ़ायरिंग हुई और फिर हमलावर मोटरसाइकिल पर फ़रार हो गए.

इस घटना के बाद, दोपहर में बीबीसी हिंदी को भेजे गए एक ई-मेल में ख़ुद को इंडियन मुजाहिदीन बताने वाले एक संगठन ने सीधे इस घटना का ज़िक्र किए बिना 'भारत प्रशासित कश्मीर में मारे जा रहे निर्दोष लोगों का हवाला देते हुए दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में चेतावनी दी है.'

"क्या कहना है प्रत्यक्षदर्शियों का"
गोलीबारी के दो घंटे बाद जामा मस्जिद से थोड़ी दूर एक पुलिस थाने के पास एक कार में भी आग लगी. बम निरोधक दस्ते ने जांच के बाद उसमें से एक प्रेशर कुकर जैसा सामान निकाला है लेकिन इसमें भी जान माल का कोई नुकसान नहीं हुआ है.

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने शाम को बीबीसी से बातचीत में कहा कि इस घटना में घायल दोनों विदेशी सैलानी अब ख़तरे से बाहर हैं.

राजन भगत ने इस घटना में किसी चरमपंथी संगठन का हाथ होने से इंकार करते हुए कहा कि ये किसी आपराधिक गुट का काम लगता है. उनका कहना था, '' ये पुलिस को निशाना बना रहे थे. किसी चरमपंथी संगठन का इसमें हाथ नहीं लगता है.''

इंडियन मुजाहिदीन का भेजा संदेश
घबराने की ज़रूरत नहीं: शीला दीक्षित
"एज़ वी ब्लीड सो विल यू सीप.....सावधान ये अल्लाह के शेरों की पहल है. हम आपको चेतावनी देते हैं कि यदि दम है तो आप कॉमनवेल्थ खेल आयोजित करके दिखाएँ. हमें पता है खेलों की तैयारियाँ चरम पर हैं. सावधान ! हम भी आश्चर्यचकित कर देने के लिए पूरी तैयारी कर रहे हैं..."


बीबीसी को भेजे ईमेल में जामा मस्ज़िद के पास हुई घटना का ज़िक्र किए बिना कहा गया है - "अल्लाह के नाम पर, हम ये हमला आतिफ़ अमीन, मोहम्मद साजिद को श्रद्धांजलि के रूप में पेश करते हैं..."

पाँच पन्ने के ई-मेल में कहा गया है - "एज़ वी ब्लीड सो विल यू सीप.....सावधान ये अल्लाह के शेरों की पहल है. हम आपको चेतावनी देते हैं कि यदि दम है तो आप कॉमनवेल्थ खेल आयोजित करके दिखाएँ. हमें पता है खेलों की तैयारियाँ चरम पर हैं. सावधान ! हम भी आश्चर्यचकित कर देने के लिए पूरी तैयारी कर रहे हैं...."

ग़ौरतलब है कि दिल्ली में दो हफ़्ते बाद राष्ट्रमंडल खेल शुरु हो रहे हैं और राजधानी में अनेक विदेशी नागरिकों के पहुँचने की संभावना है.
इस घटना के बाद दिल्ली में तनाव फैल गया है और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने लोगों से शांत रहने की सलाह दी है. दिल्ली और मुंबई महानगरों में हाई एलर्ट की घोषमा कर दी गई है.

जो लोग घायल हुए हैं वे दोनों ताईवान के नागरिक हैं. वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में भर्ती हैं और ख़तरे से बाहर हैं. गृह मंत्रालय और सुरक्षा बल सतर्क हैं और पूरे मामले की जाँच चल रही है. लोगों को घबराने की ज़रूरत नहीं है, सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी की जा रही है
"मुख्यमंत्री शीला दीक्षित"

फ़िलहाल दिल्ली के प्रशासन और पुलिस ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि ये चरमपंथी घटना है या नहीं. दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने फ़िलहाल इस घटना के किसी तरह के चरमपंथ से जुड़े होने की बात नहीं कही है.

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा है, "जो लोग घायल हुए हैं वे दोनों ताईवान के नागरिक हैं. वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में भर्ती हैं और ख़तरे से बाहर हैं. गृह मंत्रालय और सुरक्षा बल सतर्क हैं और पूरे मामले की जाँच चल रही है."

'राष्ट्रमंडल खेलों में सुरक्षा तगड़ी'

"संयुक्त पुलिस आयुक्त करनैल सिंह"
दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त करनैल सिंह का कहना है, "मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों ने सात-आठ राऊंड फ़ायरिंग की है. इन्होंने रेन कोट पहन रखे थे. घटनास्थल से गोलियों के चार छर्रे बरामद हुए हैं. इस घटना में दो लोग घायल हुए हैं. मामले की जाँच चल रही है."

जामा मस्जिद के शाही इमाम बोखारी ने एक टीवी चैनल को बताया, "लगभग साढ़े ग्यारह बजे वे गेट नंबर तीन के दरवाज़े के बाहर थे जब मोटरसाइकिल पर सवार लंबे कद के दो नौजवानों ने स्टेन गन से फ़ायरिंग की. जब उन्हें एक व्यक्ति ने चुनौती दी और उनके पीछे भागा तब वे इलाक़े से भाग निकले."

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/09/100919_delhi_firing_as.shtml

रंगीन होना क्या है?

दिवार पर बनी एक एसी तस्वीर जो न भगवान की है और न ही किसी मजदूर की वो न तो नेता है और न ही कोई भिखारी है पर वो तस्वीर किसी इंसान और मन की धारणा से मिल कर कोई काल्पनिक छवि को उभारती है। वो वोल-पेंटिंग दिवार की एक साइड को रंगीन बनाए हुऐ है पर गली की दिवार की रंगत से हमें क्या सीख मिलती है?
या उस पेंटींग से हमे क्या सीख मिल रही है मुझे समझ नही आता। रोज़ सुबह-शाम आते जाते उसे निहारता हूं,
सोचता हूं कि वो क्या बदलाव ला रही हैं निहारने और रुककर देखने वाले के लिए?
इतना सोचता हूं और अपने सवाल को अपनी ही बगल में दबा आगे बढ़ जाता हूं। क्योंकि हर बार सवाल के हैर-फैर मे मैं खुद हू उलझ जाता हूं और कुछ और ही सोचने लगता हूँ कि वो किसी की जिंदगी मे बदलाव लाए या न लाए पर वो पेंटींग दिवार की रंगत मे ज़रुर बदलाव लाए हुऐ है, रुककर देखने और दिवार पर सोचने का बदलाव लाए हुऐ है, जो हर दिवार के नसीब में कहां।

जैसे मेरे घर की दिवार जिसे मैने आज तक मन लगाकर नहीं निहारा पर जब भी कोई महमान घर पर आता है तो वो इसी चार दिवारी को निहारकर बोलते है घर तो बड़ा अच्छा है।

सैफू.

देखने में सब बाज़ार लगते है।

शोर-गुल में भी नज़ारे खुशगवार लगते हैं
भीड़ में खड़े आगे बड़ने के इंतज़ार में लम्हें बे-इंतज़ार लगते हैं।
कोई इधर झाके, कोई उधर झाके
देखने में सब बाज़ार लगते हैं।

चीज़े तितर-बितर है, लोग चलने में मशरूफ लगते हैं
कदम ना बड़े आगे तो वो बातों में लगते हैं।
निकल पड़े हैं सब घरों से, सजने को बेकरार लगते हैं।
देखने में सब बाज़ार लगते हैं।

गलियां बन गई हैं छटने के रास्ते
सीधी सड़क पर सब चलते से लगते हैं।
आवाज़े बन गई हैं रुकने के बहाने, आपस में सब बतियाते से लगते हैं
देखने में सब बाज़ार से लगते हैं।

रह गया हैं कोई मंज़र पुराना
ठिकानों की सब तलाश में लगते हैं
बेफिकरी में घुसते जा रहे हैं सब, एसे में सब बेकार लगते हैं
देखने में सब बाज़ार लगते हैं।

कहीं खान-पान का मेला तो खरीदारी का ज़ोर
सब एक-दूसरे की ज़रूरत सी लगते हैं।
ना हो ज़ोर किसी पर, तो वो घूमने में लगते हैं
देखने में सब बाज़ार लगते हैं।

जाने, अंजाने रिश्तों को लोग अपना बनाने
क्यूँ निकल पड़ते हैं
सब एक-दूसरे में भूले-बिसरे से लगते हैं
देखने में सब बाज़ार लगते हैं।

पकड़कर हाथ किसी का रिश्ते की नई शुरूआत में दिखते हैं
मान जाता है कोई तो बातों की पहल में लगते हैं
देखने में सब बाज़ार लगते हैं।

कैसे कहूं मैं भीड़ इसको
ऊपर से देखने का धोका भी हो सकता है
उतर कर बाज़ार में क्या कह सकता हूँ मैं
देखने में सब बाज़ार लगते हैं?


सैफू.

रमज़ान-ऐ-मुबारक


साल का एक अकेला एसा महीना जो चमका देता है पुरानी दिल्ली को "रमज़ान-ऐ-मुबारक" रमज़ान की रोनक को अगर महसूस करना हो तो या उसे खुद में शामिल करके मज़े लेना हो तो पुरानी दिल्ली से बढ़ियां जगह और कोई हो ही नही सकती। चकाचौन और भीड़-भाड़ वाला माहौल पुरानी दिल्ली को देखने लायक बना देता है "कहते हैना- हीरे में भी खूबसूरती तभि आती है जब उसे निखारा जाता है, उसे किसी रूप में जड़ा जाता है।

लोगों का मिलना-जुलना, 24 घन्टों की चहल-पहल और बाज़ार- देखने और घूमने का मज़ा बनाए रखते हैं।
घूमने का मज़ा यहां हर कोई उठाता है घर से अगर अफतार का सामान लेने भी निकलना होता है तो वो मज़ा बरकरार रहता है। इधर-उधर ताकना चलता रहता है यहां माहौल दोनो पार्टी के लिए एक जैसा है, लड़कियां भी बहुत मज़े लेती हैं बाज़ार के- ये पता होते हुए भी कि बाज़ार में छेड़छाड़ लाज़मी सी बात है सज-धज के निकालती हैं।
ताका-ताक़ी बराबरी की होती है कुछ बे-खबर होते हैं तो कुछ ज्ञानी इन मामलों में पर इस बीच बाज़ार धड़ाके से खरीदारी में जुटा होता है।

हर किसी को जल्दी है ईद की तैयारी की तरह-तरह के सूट, पेंट, शर्ट-टी-शर्ट, बेल्ट, बुंदे, चूड़ियाँ... ये-वो अगड़म-सगड़म तरह-तरह की तैयारियों से भरा बाज़ार, अपनी और खरीदारों की ज़रुरतों से बना बाज़ार, इधर-उधर की तरह-तरह की बातों में लगा बाज़ार कभी त्योहारों तो कभी सण्डे को सजता बाज़ार कभी उसने बोला चलो बाज़ार कभी मैंने बोला चलें बाज़ार...

खैर ये तो माहौल की बात है रोनक इसकी खासियत है और भीड़-भाड़ एक आम बात लेकिन लोगों का सड़कों पर रातों का गुज़ारना बाज़ार को और होसला देता है देर रात तक सजने का। बरसों से चला आ रहा है ये रिवाज़ कि यहां रोनक को, आवाज़ों को, चहल-पहल को, मिलने-जुलने को ही ये जगह अपनी खासियत मानती है।
और आज भी यहां के लोग उसी अंदाज़ में रमज़ान की रातों को गुज़ारतें है जैसा उन्होने देखा उसी को अपनाया। ज्यादातर लड़के रातों को मस्ती करते है, कोई घूम-घूमकर तो कोई मंडली बना कर जिसमे यार दोस्तों की हसी मज़ाक से आस-पास मे जान रहती है।

जामा मस्जिद सजता है उनके लिए जो आते हैं वहां ये सोचकर चलो चलते हैं जामा मस्जिद घूमने अभी वक़्त है सेहरी में, अज़ान की गूंज बहुत खास है यहां के लिए- अज़ान होते ही कुछ घरों से कुछ सड़कों से लड़के आदमी सिमट जाते हैं मस्जिदों में, सड़कों पर बचतें हैं बस बे-नमाज़ी या औरतें जो उनके लिए शोपिंग का सबसे अच्छा टाइम है। पर ये सकून सिर्फ कुछ लम्हों तक ही रहता है उसके बाद फिर एक भीड़ बाहर आती है और माहौल की वो आवाज़ें, चहल-पहल, आवारग़ी जिसे हम रोनक कहते है वो रचा जाता है।


सैफू.

मेरा प्यार...

मनचला-मनचला बोलकर वो मुझसे मुह मोड़ लेती है,
फिर क्यों रात को फोन पर वो मुझे आई लव यू कहती है।
आवारा हूं मैं, बोलकर कभी तो वो मुझे जगहों में कोसती है,
जाने फिर क्यों रात को फोन पर वो मुझे आई लव यू कहती है।

जब गलियों मे रोककर बोलता हूँ उसे जान, जानू, सुनो तो,
तब कोई जवाब नहीं देती,
पर क्यों रात को फोन पर "जान बोलोना मुझे" वो कहती है।
तुम कितनी कोमल हो, अच्छी हो, खूबसूरत हो रोज़ कहने से झिझकता नहीं मैं,
लेकिन हर बार फोन करने के बाद ही क्यों ये बातें याद आती हैं।

कई चहरों से प्यार करता हूं मैं, रोज़ एक नया चहरा ढूढ़ता हूँ,
उसका चहरा तब सामने जाता है जब फोन पर मिस-कोल देती है।
कितना प्यार करते हो मुझसे?, ऐसे सवालों में मुझे घेरे रखती है,
क्यों वो मुझे फोन पर बचकानेपन में आई लव यू कहने पर मजबूर कर देती है।

कितनी बार सोचता हूँ कुछ खिला-पिला दूंगा तो प्यार बढ़ जऐगा,
कहीं घुमा-फिरा दूंगा तो प्यार बढ़ जाऐगा,
पर जब भी मैं गली से गुज़रते उसके कदमों मे अपने कदम मिलाता हूँ,
तो वो "कोई देख लेगा" ये कहकर गली ही बदल लेती है।
कभी खिड़की से कभी छत पर वो रोज़ मिलने आती है, इशारा फोन का बनाती है,
रात को फोन पर कहता हूँ "कहीं घूमने चलो" तो बहाना परेशानी बताती है।

दो दिन बात करो तो फोन पर बड़ा चिल्लती है, कहती है
"पता है कितनी परेशान हो गई थी मैं"
मैं बातों-बातों में कहता हूँ रिचार्ज करवा दूं क्या तुम्हारे फोन का,
तो जवाब हाँ मे बताती है।
कभी दुपट्टे में तो कभी बुरखे मे जब वो बाज़ार मे निकलती है,
उसकी नक़ाबी आँखों मे, मैं उसे पहचान लेता हूँ,
मैं उसके इतने करीब कैसे ये देखकर वो सर्रा सी जाती हैं।

मैं रात को फोन पर पूछता हूँ "अपने बारे में भी कुछ बताओ"
तो वो घर के बाद मुझसे प्यार करती है, बड़ा ही शर्माकर बताती है।
एक घंटा, दो घंटे, कई घंटे बातचीत का सिलसिला चलता रहता,
फोन थका, मैं थका क्या तुम थक गई हो, "सोना कब है?"
तो वो टाईम सुबह होने तक बताती है।

कई बार उसका हाथ पकड़ा तो वो छुड़ाकर भाग जाती है,
सीढ़ीयों पर उसे जकड़ा तो वो सिमट सी जाती है,
जब रात को उससे फोन पर पूछता हूँ "कैसा महसूस हुआ था तुम्हें?"
तो वो उसी को प्यार बताती है।
उस प्यार का क्या फाएदा जिसमे मिलन हो, एक दूसरे से मिलने वाली सर्रसराहट हो,
मेरी इस बात पर जाने क्यों बैशर्म हूँ मैं जताती है।

डरती है मिलने से, करीब आने से, कहती है तुम डाकू हो गांव लुट जाऐगा,
फिर सज-सवर कर क्यों निकलती हो जब गांव की फिक्र है,
तो वो दूर रहने मे ही भलाई बताती है।
पल-भर में चहरे के बदलते भावों से वो ये एहसास कराती है
"मैं तुमसे बहुत प्यार करती हूँ"
फिर क्यों रात को फोन पर वो इन बातों को सिर्फ दिखावा बताती है।

मैं सोचता हूं कि ये मेरी सेटिंग है, वो कहती है तुम मेरे जानू हो,
मैं पूछता हूँ शादी करोगी मुझसे ?
तो क्यों वो फोन का "ऑफ बटन" दबाती है।


सैफू.

क्या नाम है तुम्हारा ?

मैंने देखा था उसे गली से गुज़रते हुऐ, पीछा करके पूछा "क्या नाम है तुम्हारा?"
वो घबराई, हिली-डुली बोली - "चल आवारा"
घर के नीचे खड़ा रहता था शाम होते ही उसके,
वो आती थी वहां जहां था उसका चौबारा।

एक दिन फिर उसे सीढ़ियों से उतरते देखा, पूछा- "क्या नाम है तुम्हारा?"
वो बिना कुछ बोले सीढ़ीयों पर चढ़ गई दोबारा।
जिस दिन ना दिखे वो गली में, मैं रास्ता तकता रहता था,
अपने में बड़बड़ाता रहता था, बस एक बार दर्शन हो जाए दोबारा।

नज़रों में उसकी जैसे जादू सा था, मन करता था देखूं उसकी आखों में
एक रंग बदलता आसमां नज़र आता था मुझे उसकी झपकती आँखों में।
वो शाम को आती थी, मेरे आगे से सीधी निकल जाती थी,
शायद उसके भी मन मे आया होगा " पूंछू क्या नाम है तुम्हारा?"

बोरियत जैसा कोई शब्द नहीं था मेरी जेब में, जेबों में हाथ डाले खड़ा रहता था,
वो आएगी ये इंतज़ार था, तब मैं पूछूंगा "क्या नाम है तुन्हारा?"
वो मिली मुझे पल्ली गली में, बोली- "रोज़ मेरे घर के नीचे क्या काम है तुम्हारा?"
मैंने उसका हाथ पकड़ा, बोला- "आई लव यू ,अब क्या जवाब है तुम्हारा?"

कहने लगी- एक दिन गली के कोने में लेजाकर, मैं कोई प्यार-व्यार नहीं करती,
मैं तंग हूँ तुमसे, पीछा क्यों करते हो मेरा,
मैं मुस्कुराया, बोला- एक बार बात करनी थी तुमसे बस काम हो गया हमारा।
वो नज़रे झुकाकर जाने लगी जब, मैंने धीमे से पूछा "क्या नम्बर है तुम्हारा?"

वो मुस्कुरा कर बोली- रहने दो, कुछ नही रखा इन चीज़ों में,
मैं भी मुस्कुरा कर बड़बड़ाया- यही तो काम है हमारा।
मुझे यकीन था वो मिलेगी मुझसे ज़रूर क्योंकि अब प्यार एक-तरफा नही,
हो चुका था हमारा।

कल के दिन इंतज़ार की वजह बदल जाएगी
वो आएगी अब मेरी गली में पूछेगी "क्या नाम है तुम्हारा?"


सैफू.

बनाने से बनने तक...

वहां से होकर गुज़र जाने वाले क्या समझते हैं उस जगह को, वहा बैठे लोगों को, उनकी सोच से परे ये जगह आपके सामने हमेशा वेलकम ही बोलती नज़र आती है। कभी वहां की आँखों से तो कभी वहां की बातों से...
इस जगह से कभी गालियाँ बाहर आती है तो कभी उनका बचपन या बचपना, कभी किसी का बड़ा होना बाहर आता है तो कभी किसी का सीख का गुरूर....

सबके बनने या बढ़ने का दायेरा चाहे कितना ही क्यों न हो वो निकलता है उसी गेट से जहां से वो जगह मे शामिल हुआ था।
हर कोई अपने लिए उस चार दिवारी में कुछ न कुछ तैयार ही करता मिलता और जब बाहर आता लोगों या महफिलों में उतरता तो एक पहचान, नाम या अंदाज़ मे, जिससे कभी उसे नवाज़ा भी जाता तो कभी चिड़ाया भी।
कभी वही नाम और अंदाज़ उसकी कमाई का ज़रिया बन जाता तो कभी मज़ाक की शक़्ल मे उसे खड़ा कर उसके नाम और अंदाज़ से मज़ाकिया माहौल तैयार किया जाता।

बनने वाला भी उन्ही में से कोई एक होता और बनाने वाला भी।


सैफू.

शरीर...

जिम की तस्वीर को अगर देखा जाए तो उसका सामान ओर आकर्षित शरीर ही उसकी नज़र को और गाढ़ा करता है।
जो कई तरीकों से अपने आकर्षण को बयां करते फिरते हैं, कभी दोस्तों की मंडलियों में तो कभी देखा-देखी में जिसमें बनने-बनाने की बातें जो सामने वाले से होकर आपके अपने शरीर की बनावट तक आकर रूक जाती हैं। कि
"काश मैं भी ऐसा होता?“
अगर मैं भी जिम जाने लगू तो कैसा लगूंगा?

मेरे शरीर के साथ-साथ मेरे कपड़े पहनने के तरीकों में कितना फर्क आ जाएगा? ऐसे कितने ही सपने जो कल्पना की उड़ान में हमको हमारा जिम से जुड़ा आने वाला कल दिखाता है। ऐसी बहुत सी बातें या अपने आप को देखने की नज़र का बदलना दिमाग में जिम की तस्वीर को और गाढ़ा कर देता है और फिर एक ज़िद्द या अच्छा शरीर पाने की तमन्ना हमको जिम की ओर खींच लेती है।

जिसके खिंचाव के दोरान ऐसे बहुत से शरीर, बहुत सी बातें आपकी उत्सुक़्ता को और बढ़ा देती है जिसमे हम कई पड़ावों को अपना लेते हैं सिर्फ़ अपने मैं के लिए और वो पड़ाव कभी जिम को लेकर खर्च होता है तो कभी उसके लिए टाइम निकालना या दोस्तों से कटना। और यही मैं अपने आपसे एक आस लगा बैठता है, पतले हाथों को डोलों में तबदील होते हुए, पतले बदन को चौड़ा सीना बनते हुए देखना चाहता है

जिसमें मैं भी सामने वाले के लिए एक आकर्षण बनके निकलू और ओरों को एक नज़र दूं कि "ऐसा होता है शरीर"


सैफू.

शख़्सीयत

एक ऐसी छवि जो बाज़ार में तो कभी गलियों में घुमक़्कड़ों की तरह जिंदगी के रंगों को जीते हैं और हमारे आस-पास भी ऐसे कई शख्स हैं जो हमें बहुत से नुक्कड़, चौराहों और गलियों में गाना गाते, अपने आपसे बातें करते, चीखते-चिल्लाते और उन बच्चों को गालियाँ बकते नज़र आते हैं - जो उन्हें पागल-पागल कहकर चिड़ाते हैं।

न वो ये साबित कर सकते हैं कि वो पागल नहीं हैं और न वो कहते की जुबान रोक सकते हैं वो बस उनसे दूर अपने आपको कहीं समेटना चाहते हैं, कहीं किसी कोने में। जो कौना समाज उन्हे नहीं देता और अगर देता भी है तो एक चुप्पी के साथ... जिसमें न उनको सुनने वाले कान होते हैं और न ही बत से बत्तर हालात में देखने वाली आँखें, न रहने को छत और न पहन्ने को साफ कपड़े, कोइ ढ़ैर सारे लिहाफ-बिसतरों मे लिपटा दिखाई पड़ता है, मौसम चाहे कैसा भी हो उसे न गर्मी लगती है और न सर्दी...

तो कोई सिर्फ़ चार पट्टीयों मे लिपटा सड़को पर घूमता रहता है।
उसके लिए न शर्म है और न लोगों के ताने कि "तूने पहन क्या रखा है?"
और अपने नंगे शरीर को पूरे बाज़ार में लिए फिरता है न कोई उसको दो कपड़े पहनाने वाला है और न कोई ये कहने वाला कि "दो कपड़े तो पहन ले"

कोई-कोई तो इस कदर चीख़ता हुआ दिखता है कि मानो उसको कोई सरे-आम सड़क पर हंटरों से मार रहा हो पर उसको मारने वाला कोइ नहीं होता वो अपने आप उस चोट को महसूस करता और जोर-जोर से चिल्लाता, अजीब-अजीब सी आवाज़ें निकालता, न जाने वो जोर और वो कड़कपन उसकी आवाज़ में कहां से आता है?

कुछ ही दिन पहले की बात है एक शख्स दिल्ली गैट से पहले पड़ने वाले तिराहे चौक के एक साइड में बैठा अपने आप में बड़बड़ा सा रहा था। मैं उसे देख वहीं एक जनरल स्टोर पर रुक गया और कुछ खरीदने लगा। बार-बार मेरी नज़रें उसे देखने और मेरे कान उसे सुनने को बेचेन से हो गए थे। दुकानदार ने पूछा भी कि ....
क्या लेना है ?
मेरी नज़रें एक पल उसकी तरफ मुड़ी और वापस उसको देखने लगी और होटों से आवाज़ निकली " ब्लू पेन देदो कोई सा " अपने हाथों को कान पर लगाए मोबाइल की कल्पना ने उसे अंधा बना दिया था कि उसके पास मोबाइल है।
मैं उसे ही देख रहा था।

वो : " हैलो हां मजिस्टेड साहब हां मेरी कल की फ्लाइट है, मैं कल नहीं आ सकता "...
" हाँ हाँ वो मैं अभी एक जरूरी मीटींग में हुँ मैं कल आउंगा "...
" हैलो शुकला साहब मेरी अमेरीका का टीकट कटवा दो, मैं कल आपसे मिलनें आउंगा "...

ऐसी कई सारी बातों से वो अपने आपको एक रहीस आदमी की छवि में उतारता और उसे भूल जाता जो दुनियां देख रही हैं पर वो नहीं कि वो मैले-कुचेले कपड़ों में, बिना जूतों के मोज़ों में, कुड़े के ढ़ैर के पास बैठा, शक़्ल पर बेवारसी और होंटों से निकलती बनावटी हँसी और शब्द।......
न जाने वो हर काम कल पर क्यों टाल रहा था और कल की सोच की वजह से ही शायद वहां पड़ा था। रोज़ एक नया कल पर आज की कोई छवि नही।

खैर मैं दुकानदार को बिना कुछ दिये और बिना कुछ लिये ही वहां से आगे बड़ गया। ये सोचता हुआ कि " सारे उलटे-सीधे दिल्ली में ही पड़े हैं। " उसे देखने के बाद और बाद में उसे सोचने पर मुझे मन ही मन हँसी आती रही कि
हालात चाहे कैसे भी हों पर उसका सपना छोटा नही था।



सैफू.

छत्ता लाल मिया " जिम "

ये एक लोकल जिम है जिसकी बनावट कुछ खास नहीं है। पुरानी दिल्ली में ऐसे कई जिम गलियों-चौराहों पर चलते हैं जो अपनी बनावट से ज्यादा उसमें एक्सर्साएज़ कर रहे बन्दों पर गोर करते हैं वैसे यहां के आस पास के सभी जिम 60-70 गज की लम्बाई-चौड़ाई में ही बने हुए हैं जिसमें 100 से 150 बन्दे रोज़ के आते हैं, बाकाएदा उनकी रजिस्टर में एंटरी होती है और महीना आते ही याद दिला दिया जाता है कि
"भाइ आपका महिना हो चुका है" !
जिम अकसर दो टाइमिंग में चलते हैं सुबह 6 से 11 और शाम 5 से 10, यहां लड़कों में जिम का इतना शौक़ हैं कि सुबह-शाम ये दोनों टाइम ही भरा हुआ मिलता है।

यहां का अपना ही एक माहौल होता है जो हमें बाहर की एक समझ देता है कि लोग अब लोगों को कैसा देखना चाहते हैं।
मैं अपने आप में कैसा दिखता हूं और क्या बनना चाहता हूं? ये सवाल अपने आने वाले कल को लेकर ही होता है पर सिर्फ दिखावे में जो दिखता है उसके लिए। कुछ बनने से पहले हम उस दुनियां की कल्पना में खोये रहते हैं जो हमको उस बहाव में तैरने का एहसास देता है।

दोस्तों के बीच खड़े होने का तरीका और सड़क या बाज़ार में घुमने के स्टाइल की एक हवा सी गुज़रती है दिमाग में जिसके झोके हमको जिम से बांधे रखती है। फिर ख्याल आता है कि आप उस जगह में अकेले नहीं हो वहां आप जैसे शुरूआती बहुत हैं, जो अपने से और उस जगह से एक दिलचस्पी से जुड़े हैं।

जिम की बनावट और यहां की सजावट हमको एक ऐसे आकर्षण की ओर ले जाता है जो आप चाहते हो। इसका मैन मुद्दा है अपकी चाहत को समेट कर लाना और उत्साहित करना।
फिल्मी हीरो के फोटो लगाना, सलमान खान बिना शर्ट के, जोहन इबराहम की चेस्ट, शाहरूख के सिक्स पैक, उदय चौपड़ा के डोले और बाक़ी होलीवूड की फोटो, आर-नोल्ड वगैरह...

इन सब शख्सियतों को देखने पर देखने वाले को क्या उत्सुकता मिलती है ये समझ हर जिम के पास होती है वो अच्छे से अच्छा फोटो लगाता है, क्योंकि ये सब शख्सियतें ही उसके जिम का आकर्षण हैं, इतना सब देखने और अपने साथ एक्सर्साइज़ कर रहे छोटे-बड़ों से इतना तो पता चल ही जाता है कि शुरूआत क्या है और आगे क्या होगा।

बहुत से ऐसे लोग भी मिलते हैं जो हमको इसका अन्त समझाते हैं कोई रोककर तो कोई सलाह मशवरे में। इस जगह आपसी बातचीत का एक अलग ही रोमांच है जो बाकी सब जगहों से अलग है
जिसमें हमउम्र होने की वजह से अपनी बात को कही भी रखने में कोई झिझक नहीं होती, जिसमें "धिरे से बोल"
ये लाइन कहीं खोई सी लगती है।

जिम में नए चहरों को देखकर लगता है कि इनके भी कई सपने होंगे इस जगह से जुड़ी कितनी ही उम्मीदें और बातें होंगी, जिसको पूरा करने की आस में ये या तो सफल हो जाएगें या फिर कुछ टाइम बाद एक ऐसा समय अएगा कि ये भी मेरी तरह जिम आना छोड़ कर, उसके सपनों और यादों में ही घूमते रहेगें।



सैफू.

Delhi-06

दिल्ली 06 उन पहलूओं से बना हुआ है जो पल-पल हर एक नज़र में आपको एक नई भाषा देता है माहौल को बयां करने की, जिसमें टाइम-टेबल और सिमटते माहौल में भी एक-दूसरे को वो खुशी बांटते चहरें मिल जाते हैं जो इस दौर में कहीं गुम से लगते हैं।
पल-पल की कीमत होती है ये कहता है हमारा समाज, घर-परिवार, हमारा खुद पर हमारा खुद भी हमसे कुछ चाहता है और उसी चाहत में लिपटे लोग अपने खुद को महफिलों मे उतार आ मिलते हैं जिल्ली-06 की उन जगहों में जो कि कहीं देखने को नहीं मिलता। क्योंकि हर जगह अपना समाज खुद तैयार करती है और दिल्ली-06 का अपना खुद का समाज है तभी इसे पुरानी ज़ुबानों से लेकर आज तक पुरानी दिल्ली ही कहा जाता है जिसमें कहने-सुनने वालों की भाषा भी वही मांगता है जो उनका खुद चाहता है।

लोगों की चाहत से जगहों का बनना पुरानी दिल्ली की ख़ासियत है। जिसमें हर एक जगह अपने होने पर गर्व करती है और वहां से निकलती आवाज़े कहती हैं "हम अपने मालिक खुद हैं, कोई ओर कौन होता है हमें रोकने वाला" जिसमें कभी बड़े-बूड़े अपनी बहकती आवाज़ में कहते नज़र आते हैं
"पुरानी दिल्ली, दिल्ली का वो कोना है, जो दिल्ली को पहचान देता है।"
"यहां जैसा बाज़ार और महफिलें ओर कहां?”
"दिल्ली बदल रही है पर पुरानी दिल्ली जो थी वो है और अल्लाह ने चाहा तो ऐसी ही रहेगी"

तो कभी घूमते चहरे, आवाज़ें लगाते बैझिझक लोग माहौल को बदलाव के भाव में उतारते से लगते हैं। जिसमें कभी चाय के ठिए शामिल हो जाते हैं तो कभी रेढ़ियों पर लगा फल-फ्रूट का मेला जो रोज़ की रोनक है। कभी ओरों की चाहत को अपनी दुकान मे सजा लोग खेंचते नज़र आते हैं लोगों को तो कभी लड़ाई झगड़ो से शांत सी दिखती गलियाँ, चौराहें और बाज़ार।

बाहर दिखता है वो जो सुनने में आता है पर इसके अंदर अपनी चाहतों के दरवाजों को कोई खोले बैठा है।
हर एक गली, हर एक मोड़ और चौराहा उसमें रहने वालों की मांग और चाहत की समझ से बनाए बैठा है वो महकमें जो टाइम-पास जैसी भाषा में अपने को वहां जमाए हुए हैं जिसमें उतरकर कई लोग जीते है, जिसमें जगह और लोग एक दूसरे की रोज़मर्रा को सजाते से लगते हैं।
कैरम क़्लब, चाय की दुकानें और ठिए, वीडियो गेम, जिम ऐसे कई महकमें अपनी अपनी परिभाषा लिए पुरानी दिल्ली मे उसी के टाइम-टेबल के अनुसार अपनी व्यवस्था और बनावट में हैं।

सैफू.

इस बनने की शुरूआत कैसे हुई?

राहों से अपनी पसन्द की चिज़ों को चुनकर इकठ्ठा करना और अपना घर तैयार करना।
यही तरीका है केरम क्लब के बनने का जिसमें क्लब का मालिक अपनी मर्ज़ी से क्लब को किसी तैय्यारी में सजाता है।

पसन्द न पसन्द आर्कषण के मुताबिक माहौलों को देखकर तैयार करता। जहाँ माहौल टाईम-पास होने का या करने का समय नहीं देता वहाँ केरम जैसे टाईम-पास खेलों को जगह मिल जाती है। जिसमें महफिल बनती, जुड़ती, संवर कर अपना खेल पैना करती नज़र आती है। खेल को पैना करना और उस खेल को बनाए रखने की होड़ में महफिलें इन जगहों को अपनी रोज़मर्रा में जोड़ लेती है।
एक केरम क्लब अपनी लम्बाई-चौड़ाई को जब तक लोगों की मौजूदगी से भर नहीं लेता तब तक कैरम क्लब खाली सा लगता है पर जब भीड़ होती है तो जगह का मालिक अपनी बनावटी दुनिया से खुश हो जाता है।

दो कैरम बोर्डो का यह महकमा सिमटता और अपने में सबको समेटता सा लगता है।
पर सब भूल लोग अपने हुनर को दिखाने में लग जाते हैं जिसमें से अनेक परछाईयाँ अपना प्रतिबिम्ब छोड़ चली जाती हैं। जिनकी छोड़ी गई धूल हर कोने में लगी दिखती है। वो कोना उनकी याद के साथ तैयार हो कर कुछ पलों को याद करने का रुप बन जाता है।
हर किसी के पास अपने समय का चक़्कर अपने हाथ की उंगलियों पर गढ़ा है। जिसमें से हर उंगली अपनी एक प्रतिक्रिया में मशरुफ़ नज़र आती है। जिसके खाली स्पेस में केरम जेसा खेल अपना भराव बनाए हुए है।

जगहें ...

कई जगहें हमें अपने आप मे सिमटने और बहने के बहाने देती हैं, वो बहाने जो कभी हमारी आदत में शामिल हो जाते हैं तो कभी रोज़मर्रा की रूटीन में अपनी एक जगह बना लेते हैं। और उनका ये जगह बनाना हमें उस पर सोचने और बोलने के कई तरीके दे जाते हैं, वो तरीके जो कभी हम दोस्तों की मण्डलियों में बोलते नज़र आते हैं तो कभी किताबों मे लिखते।

क्योंकि हर जगह पहले वक़्त मांगती है फिर आपकी आदत और फिर उसके तरीकों की एक समझ कि यहां कब, कैसे और क्यूं?
और वहीं समझ हमारे शब्दों में उस जगह के लिए एक शब्द और जोड़ देती है, कभी
वाह-वाह में तो कभी टाइम-पास में कभी मस्ती में तो कभी दोस्ती और आदत में।
जगहें अपनी समझ, अपनी बातें, अपनी अच्छाई और बुराई सब को अपने ही शब्दों में समेटे रखती है। और उसका ये समेटना जगह को बढ़ोतरी के पाएदान पर चढ़ा देता है।

क्योकि यहां आने-जाने वालों की कमी को महसूस नहीं किया जाता जिसमे बाहर से आ रहे शब्द जो बाहर के ही रहते हैं और अंदर बोले जाने वाली बोली जो सिर्फ वहीं की हैं, उस जगह को एक अलग ही जगह बना देती है।

किसी को यहां आना अच्छा लगता है तो किसी ने अपने जीवन के 10-12 साल के कई घंटे यहां दिये हैं, कोई यहां चैम्पीयन है तो कोई सिखना चाहता है, कोई रोज़ की चाय का शौकिन है तो कोई ठियों पर खड़े होकर चाय पीने को ही मज़ेदारी मानता है। सब अपनी ही धुन में है पर ये धुन सिर्फ लड़कों तक ही सीमित है अब वो चाय के ठियें हो या दुकान, कैरम क़्लब हो या वीडियो गैम की दुकान या फिर जिम....

सब अपने-अपने तरोकों से जगह से जुड़ते हैं उसे अपनाते हैं, उठते-बैठते हैं, मज़े करते हैं, खेलते हैं या खड़े होते हैं सबको अपनी जगह, मिलने वाला माहौल और आदत या शौक़ से लगाव है जो कि उस जगह से जुड़ा है।


सैफू...

" भाई ताब का कैरम क्लब "

पुरानी दिल्ली की रंग वाली गली में।

यहां लोगों के आने के कई तरीके है मतलब सबके अपने-अपने मतलब जुड़े हैं इस जगह से। यहां कोई खेलने आता है तो कोई देखने, कोई मज़ाक करने तो कोई खेल की भावना में मगन चैलेन्ज देता हुआ पर जब यहां की भीड़ अपने रंग में होती है तो पुराने खिलाड़ियों की वही मण्डलियां जो ऊच-नीच को शर्तो के बल पर तय करतीं हैं। जो कहती हैं
"है दम तो जीत के दिखा पर शर्त लगा कर" उस वक्त खेल पर खिलाड़ियों का पैसा भी लगा होता है और इज्ज़त भी, इज्ज़त तो दूसरी निकली आवाज़ से वापस भी आ सकती है पर यहां पैसों का जेब बदलना चलता रहता है। जिसमें लगता है कि यहां हर कोई अपना रुतबा तय करने की होड़ में है, ऐसे में ये देखते चहरे कि "कौन जीतेगा" बड़े उत्साहित रहते हैं कि किसने, कब, क्या गलती की और वो अगली टन आने पर क्या कर सकता है, ये वहां खड़े बाकी लोग अनुमान लगाते और कुछ-कुछ बोलते नज़र आते।
यहां शर्तों के दाम 200 से 500 तक का सफर तय कर लेते हैं सिर्फ अपने अनुभव की बहस पर। बिना बहस तो कोई यहां 100-50 की भी शर्त नही लगाता।
पर बिना शर्तों में हार-जीत का मज़ा लेते कई लोग जगह में खेल देखने और खेलने का आकर्षण बन जाते हैं शुरुआती या कभी-कबार दिखते चहरों के लिए।


...सैफू...

नज़रों से...

वो हमारी कालोनी में ही मंदिर के पास बने एक छोटे से कमरे में रहता है। उसका वो छोटा सा कमरा किसी इलेक्ट्रॉनिक कबाड़खाने से कम नहीं। उसने अपने कमरे में अपना एक कोना बना रखा है। चारदीवारी के बीच हर एक कोने में फैले पुराने रेडियो, घड़ियाँ, घंटे, अलार्म, कैमरे, पुराने वायर - कुछ ठीक तो कुछ ख़राब, जगह-जगह फैले खुले रेडियो के पुर्ज़े और उसके काम को अंजाम देने वाला हर वो सामान खुला पड़ा था, बिना किसी बॉक्स के।
उसकी इस चारदीवारी में कोई आलमारी नहीं है, बस एक टेबल है जो कोने में न होकर भी कोने में है। उस पर रखा था एक14 इंची टी.वी., जिसकी बंद मौजूदगी से मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि "क्या ये टी.वी. ठीक होगा?" पर बात तो उस शख़्स की है जो 5फुट4-5 इंच का होगा। आँखों में हमेशा मेहनती नमी और कपड़े ज़्यादातर डार्क कलर के, चेहरा गोल और हाथों में ग्रीस जैसा कालापन - जो ये एहसास दिलाता है कि बन्दा मेहनती है।
वही कमरा उसके रहने की जगह है और वही खाने-पकाने की भी। वही उसका कारखाना है और वही चारदीवारी उसका माल इकठ्ठा करने का गोदाम।
वो हमेशा अपने कमरे में अकेला या दुकेला बैठा नज़र आता, कुछ न कुछ करता हुआ।
उसकी उम्र तो मुझे मालूम नहीं पर होगी यही कोई 30 के आस-पास की। वो अकेला ही रहता है। पता नहीं उसके माँ-बाप इस दुनिया में हैं भी या नहीं। आज तक मैंने उसे सिर्फ़ काम करते ही देखा है। कभी-कभार खाली दिखता है तो इतना खुश दिखता है मानो उसकी कोई लॉटरी लग गई हो। कभी उससे पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि "भाई क्या हालचाल है?"
अक्सर वो बाहर नहीं दिखता। हाँ, कभी-कभी चाय पीने ज़रूर निकलता है। ऐसे में उससे मुलाक़ात होना मुश्किल सा था। पर कुछ वक़्त पहले उससे हुई एक मुलाक़ात ने मेरे कई सवालों की गुत्थी सुलझा दी, मसलन वो कितने समय से इस काम में अपने पैर जमाए हुए है? कबाड़ चुनने-खरीदने की नज़र उसने कितने समय में बनाई होगी? पुराना आलार्म कितने में खरीदता-बेचता होगा?
उसके कबाड़ को देखकर इस तरह के ढेरों सवाल मन में उठते थे पर एक सवाल का जवाब वो हर सण्डे कालोनी को देकर निकलता है कि उस कबाड़ का वो करता क्या है? दीवार घड़ियाँ, नये-पुराने रेडियो, ठीक चलती हुई हाथ घड़ियाँ, यहां तक कि वो कभी-कभी टी.वी. भी लेकर निकलता है। वो इतना सामान कबाड़ से कैसे ठीक कर लेता है?
सच में उसकी मेहनत या कहें उसके दिमाग का खेल है। वो जैसे ही एक बोरे में सारा सामान कंधे पर लादे कई गलियों से गुज़रता है, रास्ते में मिलने वाला शख़्स पूछने से नहीं चूकता-"आज कोई बढ़िया अलार्म है?”, “कोई अच्छी सी घड़ी है?”, "यार बोरा उतार, शायद कोई बढ़िया रेडियो मिल जाये?”
ऐसी लाइनों से होकर गुज़रता वो कई बार बोरे को कंधे से ऊपर -नीचे, उतारता-चढ़ाता, बाहर तक पहुँचता और किसी रिक्शे की ताक में खड़ा हो जाता।
जैसे ही कोई रिक्शा रुकता तो वो बोलता, "भाई चलना है इतवार बाज़ार"


...सैफ़ू...

जगह का मालिक

::: भाई आलू के नाम से जाना जाता है पता नही यह उनका नाम है या उनके मोटे शरीर के कारण रख दिया गया है। वो हमेशा नहा-धोकर, सफेद रंग के कपड़ों में अपने कैरम क्लब की नियमित रोज़मर्रा में आने वाले लोगों का स्वागत् करते रहते हैं। उनका यह मेज़बान का काम इस घूमती-फिरती पुरानी दिल्ली में दोपहर के 4 बज़े से रात के 1 बज़े तक चलता है।

जिसके बीच उनका खाना-पीना और सोना सभी उस जगह में होता। इस बीच लोग आते, खेलते और महफिलें जमाते जिसमें भाई आलू भी शरिक होते।
पर भाई आलू को कैरम खेलना नही आता उनका तो शौक़ पंतग उड़ाने का है और उनका वो शौक हमे कैरम क़्लब की दिवारों पर दिखाता है। उन्होने अपने क़्लब की क्रिम सफेदी के ऊपर कई तरह की पतंगें लगा रखी हैं जो उनके बीते समय को कहीं रोकी सी लगती हैं।
उन्हें अपना कैरम क़्लब साफ रखना पसन्द है, पर वो उन्हे भी मना नहीं करते जो अपनी पान की पीकों से दिवारों को गन्दा करते हैं। उनके लिए उन्होने कुछ छोटी बाल्टीयां लगा दी हैं जिसमें वो थूकते और पिचकारियां मारते नज़र आते हैं।
इसी तरह के सारे इन्तेज़ाम भाई आलू ही करते है। जगह उनकी ज़्यादा बड़ी तो नहीं पर उन्होने अपने क़्लब में दो कैरम लगा रखें हैं जिसमें एक बार में आठ लोग खेल सकते हैं। किसी को परेशान किये बीना ही सब अपनी मर्जी का खेल, खेल सकते हैं, हसना, चीखना-चिल्लाना जैसी अव़ाज़ों से वहां की जैसे शान सी बड़ती हो पर अपनी अंदरूनी छवि को हमेशा बाहर से दूर रखती है ये जगह। अपने अन्दर जमी चीज़ों को पिघलनें से पहले ही खत्म कर देती है।


मनोज