दोतरफा



दोतरफा शब्द हमेशा एक पहलू पर धुंधला पर्दा डाले रखता है जिसके आकार और ढ़ाचें की गणना समान होती है लेकिन रचना और भाषा की समझ पहले पहलू से बिलकुल अलग होती है। जीवन में एसे कई पहलू हमें एक धुंध में रखते हैं जिसमें दूसरे पहलू का मोल जीवनता से हमें ये आभास कराता है कि कुछ पहलूओं का धंध में रहना ही जीवन की गणना है। सच और झूट के खेल में हम हमेशा दोतरफा की बहस में रहते हैं कि कुछ तो एसा होगा जो पोल-खोल के इस पहलू से हमें एक सीधी नज़र दे सके जो कि एहसास और विश्वास के दम पर रचा जाता है।

अपने तर्क को हम सहमती के अहसास में उतार लेते है जिसको लेकर कभी समाज तो कभी सत्ता अपने तर्क के साथ हमारे बीच पेश आते हैं, तब हर एक तर्क के वज़न का एहसास कई पहलूओं की धूंध को साफ करता दिखता है जिसमें खुद की समझ से बहस करना और दूसरे पहलू को नकारनें के साथ-साथ सोच पाना मुश्किल हो जाता है।

कुछ ही दिनों पहले की बात है गली में रिया और शेहज़ाद के घर से भाग जाने की खबर से सब की बातों का एक किस्सा उनके भाग जाने से जुड गाया। सबकी बातों में सही और गलत को लेकर चर्चा थी कि सही है तो कैसे? गलत है तो क्यूं ? मज़हब को भूल कर भाग कर शादी करने वाली बात पर कूटनीती का सिलसिला आपसी बातों में घुसता जा रहा था मगर अहसास के साथ जुड़े उस रिश्ते को सोच पाना सबके लिए अपनी समझ के आगे फीका था।

ठैस पहुचना, रिश्तेदारों को जवाब देना, मर्यादा को लांगना और मर्ज़ी जैसे शब्द को समाज के बीच रख पाना ही उस पहलू के तर्क पर टिके रहने की बहस थी। लेकिन अपने खुद से, अपने समाज से झूझ के जिस रिश्ते की नीव रखी गई है उसे अगर सोचा जाए तो दूसरा पहलू कुछ और ही कहता है उस पहलू का तर्क सिर्फ अपनी सहमती के अहसास से भरा है जिसके साथ सदा से समाजिक बहस जुड़ी हुई है। कभी- कभी हम खुद को सहमती में लाने के लिए अपनी सोच को कही रोक देते है एसे में इस मुद्दे पर रिन्कू हसते हुए बोला :- सबकी जोड़ी वो ही बनाता, भाग्य विधाता।

उसकी इस बात ने समाजिक सोच और नियम को कोई धक्का तो नही दिया लेकिन उस धक्के के जोर को कम जरूर किया जिस धक्के को सोचकर वो किस्सा चर्चित था।



सैफू.

2 comments:

रश्मि प्रभा... April 20, 2010 at 4:24 PM  

vichaaron ka spasht roop nazar aata hai aapke lekh me

लोकेन्द्र April 23, 2010 at 1:23 PM  

हाँ कुछ कशिश तो जरूर बाकी रह जाता है इस दोतरफा की नीति में.....

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