"अंधेरा सिर्फ डर नहीं होता"

रात काफी हो चुकी थी हर गली चौराहे पर सन्नाटा चुप्पी साधे हुए था। एसा लगता है जैसे हर गली दूसरी गली से मुँह मोड़े हुए थी रात के 2 बजे इन गलियों में एसा कोई नज़ारा नही होता जिसे देखने की तमन्ना मन में हो।

अधेरा- जो एक काला साया सा लगता है, एक सहमा देने वाला डर जो अंधेरे की कोख से पनपता है। कई तरह की झुंझला देने वाली आवाज़े, कोई आहट, कोई दूर खड़ा शख्स या सबसे नज़दीक होते हुए भी नज़रों से ओझल एसी कई छवियां अधेरे को और भी वज़नी बना देती हैं। जिसमें उतरना मतलब- सहम जाना और घबरा जाना ऐसा डर हमेशा हम से जुड़ा रहता है
सदा से डर, हैवानियत, खौफ, वारदात और एसी कई पहेलियां अंधेरे को घोंट-घोंट कर गाढ़ा करते रहे हैं। फिल्मों से लेकर बड़े-बुज़र्गों की कहावतों और किस्सों में रात का काला स्याही अंधेरा हमें डराता आया हैं और डर को एक पहचान दी है कि अंधेरा गली, चौराहे, इलाके, मौहल्ले या शहर में जब आता है तो लोग उसे सबसे ज्यादा किस नज़रों से देखते हैं?

अंधेरे में एसा लगता है जैसे मेरी ही परछाई मेरा पीछा कर रही हो जैसे मैं भूत से नहीं बल्की खुद से भाग रहा हूं कि किसी किसी तरह ये छोटी-बड़ी होती परछाई कहीं पर आकर रूक जाए लेकिन परछाई का रुकना मेरे कदमों को कहीं से कहीं तक नही रोक पाता एसा लगता है जैसे मैं अपने आपको समेट, अपनी हर आहट को समेट बस भागा चला जाऊ- "हकीकत तो हम सब की नज़रों से दूर नहीं लेकिन सिर्फ़ ये लगना ही डर को और मज़बूत बना देता है।"
मन में उठी हर एक हड़-बड़ी कोई राहत तलाश रही होती है कि कोई तो दिखे, कहीं तो दिखे चाहे ऐसा-वैसा ही दिखे लेकिन लगे तो सही कि मैं अकेला नहीं हूं

अफरा-तफरी जैसी भाद-दौड़ लिए मैं चप्पलों की एडी से आने वाली आवाज़ को निकालते हुए हबड़-तबड़ गलियां पार किये जा रहा था इस गली से निकलकर उस गली में और उस गली से चौराहे की उस गली में जहां का अंधेरा किस्सो का हिस्सा रहा हो। आढ़ी-तेढ़ी गलियों से होते हुए मैं मंज़िल के काफी नज़दीक था लेकिन अंधेरे का वज़न अभी भी मेरे लिए उतना ही था जो शुरूआती डर में था। इतना काफी नही था कि जिस्म सहमा देने वाली कोई आहट ने दस्तक दिए।

फुसाहट की आवाज़े गली में एक अजीब सा डर पैदा कर रही थी - आगे बढ़ने का डर, दिख जाने का डर, कदमों की आहट का डर, किसी वारदात के होने का डर और वो डर जो एक गाढ़ी छवि में दिमाग में बचपन से बैठा है- किस्से कहानियों से, फिल्मों से, डरावनी और डराने वाली शख्सियतों से। आवाज़ आई, मैंने अपने कदमों की सीमित गति को थोड़ा धीमे किया कि कहीं कुछ गड़बड़ ना हो, गली बिल्कुल गुप-गाप थी।

जैसे-तैसे तो अपने आपसे भागते-भागते यहां तक पहुँचा और अब ये सीन, फुसफुसाना लगातार जारी था। मैंने एक वक़्त के लिए सोचा कि रास्ता बदल लेना ही अकलमंदी होगी पर मैंने तो सोच समझ कर ही ये रास्ता चुना था जिधर डर कम लगे, किसी और रास्ते से घर पहुचना मतलब अंधेरे में दम घुट-घुट के मर जाना। रात की चाँदनी रोशनी भी मुझे एक कदम आगे बढ़ाने की हिम्मत नहीं दे पा रही थी पर वहां खड़ा रहना भी मेरे लिए एसा था जैसे कोई बगल के दरवाज़े से हाथ निकालकर पूछ लेगा- कहां जाना है ?
और इससे बड़ा डर मेरे लिए क्या होगा ?

मैं कई तरह के असमंजस में घिरा ये सोच में पड़ गया कि- देखा जाएगा जो होगा, चुपचाप सीधा निकल जाता हूं।
आगे से आने वाली फुसफुसाहट एक बातचीत में थी ये मुझे तब पता चला जब मैंने आगे बढ़ने का होसला किया। दिवार की आड़ में दो ही कदम आगे बढ़ाए थे कि मुझे किसी के होने का अंदेशा हुआ। दो घरों के बीच एक पतली सी गली थी जिसमें कई घरों के दरवाज़े हैं उस पतली सी गली के करीब पहुच कर मुझे ये पता चल गया था कि मैं बे-फज़ूल में आवाज़ों की छवि से डर रहा था।

वहां एक हमउम्र जवान लड़का था जिसे अंधेरे की वज़ह से पहचान सका और एक लड़की थी आवाज़ से वो भी जवान लग रही थी, मैं उस गली के बाहर दिवार की लाड़ लिए खड़ा उनकी आहट और आवाज़ों से माहौल की हरकत को जानने में लगा था।

लेकिन अंधेरा मेरी जान खा रहा था लेकिन एक तरफा होसला भी मिल रहा था उन दोनों से कि- अंधेरा सिर्फ डर नही मुलाकतें भी बुनता है, बातचीत का ज़रिया भी बनता है जो कि रोशनी में बिखरी नज़रों से ओझल रहता है। वो दोनों फुसफुसा रहे थे- लड़का कहां था और लड़की कहां थी पता नही चल रहा था पर कोई एक छवि दिख रही थी परछाई सी जैसे कोई एक ही हो, लेकिन बातचीत में तो दो लोग थे।

मेरे आगे एक उलझी हुई पहेली थी और पीछे किसी के हाथ की मौजूदगी का एहसास, मैंने पीछे मुड़कर देखा गली के नुक्कड़ पर दरवाज़े से निकलती रोशनी और दूर तक सन्नाटा, आगे दो गलियों का मोड़ और जहां मैं था वहां किसी की मौजूदगी जो कि रोमांचक थी लेकिन रोमांच से कही ज्यादा वज़न लिए खड़ा था डर जो मुझे पल भर में सहमा भी सकता था। अब घबराहट जिस्म में अपना दाएरा बढ़ा रही थी जिसकी वज़ह से मैं उस लड़के-लड़की की अंदरूनी कहानी को वहीं छौड़कर आगे बढ़ गया और गलियों को उसी गति से पार किए चला गया जिस गति से मैंने शुरूआत की थी, चप्पलों की हबड़-तबड़ के साथ मैं अपने घर पहुँचा।

जिस काम से निकला था उसे मम्मी को सोपा और रज़ाई में घुसते हुए मम्मी की नींद भरी आवाज़ में जवाब मांगा।
"ऐबी रात को आज के बाद कोई काम मत बोलना इतने अंधेरे में दरते हुए आया हुं, रास्ते में एक लड़के और लड़की की आवाज़े रही थीं एक पतली सी गली में से, मैंने गौर से देखा पर पता नही चला कि वो कौन थे? एक परछाई सी दिख रही थी लेकिन एक ही परछाई थी दूसरी तो कहीं भी नहीं थी"

मम्मी ने मेरी पूरी बात ध्यान से सुनी और सलाह देते हुए कहा :- एसे कहीं भी मत रुका करो, कोई भी कुछ भी हो सकता है, रात में अंधेरे में उन गलियों में जिन गलियों मे असरात होते है वहां पिछलफेरी और सर कटे घूमते है। जो सिर्फ आग या रोशनी से ही दूर भागते है। वो बेहला-फुसला कर इंसान को झांसे में ले लेते हैं।
एसे ही बातों ही बातों में कहानियों का दौर शुरू हो गया। बड़ा भाई और बहन को दिखी एक बड़ी सी परछाई का वो किस्सा फिर सुनने में गया और अंधेरे में मेरा डर के साथ रिश्ता फिर झुंझला देने वाला बन गया।

लेकिन क्या वो गली वाली छवि कुछ और थी जो मुझे अपनी ओर आकर्षित कर रही थी ? या फिर वो उस गली का एक सच था कि अंधेरा सिर्फ डर नहीं होता।

सैफू.

1 comments:

रश्मि प्रभा... January 30, 2010 at 2:27 PM  

sach hai sab andhera darr nahi hota .......bahut hi achha laga padhkar

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