एक तराना अपना भी...

वक्त में बनते तरानों में एक तराना अपना भी...

कहते हैं किसी की नज़रों में जगह बनाने में काफी वक्त लगता है। पर नज़रों से गिरना क्षण भर का काम है। एक छोटी सी बात कब आपके दामन पर दाग लगा दे ये ना मैं जानता हूँ ना आप... । ये दाग भी कोई आम दाग नहीं होता जो किसी भी आम साबुन से धुल जाये ।इन्हें मिटाने के लिऐ फिर से अपने अतीत को दोहराना ( जैसे शब्दों का सामना करना ) पड़ता है। उसमें भी जगह की मंज़ूरी पर ही आप वहां के महौल का एक हिस्सा बन सकते हैं। "अगर नहीं" तो क्या? आप फिर लग जाते हैं नई जगह की तलाश में...

कभी-कभी आपकी निर्भरता भी दूसरों से कटने (अलग होने) की वजह बन जाती है । लोग परेशान हो जाते हैं दूसरों को अपने पर आश्रित पाकर । वो अलग-अलग चलन अपना कर आपको अपने में से काटना चालू कर देते हैं। तब उनकी हज़िरी भी आपके लिये विलोमता की गहराइयों में खो जाने का ज़रिया सी लगने लगती हैं, जिसमें लोग मिलकर भी (अलग होने) डगमगाने लगते हैं । और दुरिया नापते चले जाते हैं ' बहुत दूर '...

हम तो ठिकानो में ही रुके । पर मिला ना कोई।
जो रूठा है हमसे ।उससे शिकवा-गिला ना कोई ।

अक्सर बैठे-बैठे ये गाना गुनगुनाने लगता हूँ।"ये गलिया ये चौबारा, यहां आना ना दोबारा, अब हम तो भए परदेसी कि तेरा यहां कोई नहीं...” लगता है जिसे मिलना है, वो काफी दायरों में जा बसा है । जिसमें जाना मेरे लिये आग और पानी का खेल है। कभी-कभी सोचता हूँ कि जा लड़ूँ दीवारो से और मिटा दूँ उन कतरों को जो दूर हैं मुझसे या होना चाहते है, पर एकांत का मंज़र हमेशा रात के अंधेरो में चमकता रहता है। जो दूर रखता है मुझे मेरे उन साथियों से जो मिलकर भी अनदेखा कर देते हैं मेरी प्राथमिक़्ता को ।

दूर खड़ा हूँ मैं अकेला, सहारे का इन्तेज़ार है ।
हर शख़्स से लड़ा हूँ, क्या यही वक्त की मार है ।

लोग मिलते हैं और मिलकर खो जाते हैं। अपने बन कर अपने को ही छोड़ जाते हैं। जिसमें बचता अकेला ' मैं ' है जो घूमता रहता है एक अनजानी तलाश में । कितनी ही संभावनाएँ लिये यह कितने ही ठिकानों को पार कर बैठता है।

चाय की टेबल, भाप देती केतली, काँच के गिलास को धोते हाथ, एक कोने में पानी के टूटे गिलास, चार लोगों की बातें सुनती दीवारे, नेटवर्क ढूँढते मोबाइल, बैठने पर चरमराती कूर्सियाँ, अलमारी बना दी गई फ्रिज़, लोगो को रुख़सत करती दीवार घड़ी, सब वेसा ही हैं बस बदला जो हैं वो हूँ मैं, जिसमे वक्त अपना चक्र चला चुका है । जो समेटता जाता है अतीत को और रोशन करता है वर्तमान, जिसमें दोहराना अपनी जगह बनाए हुए है । जो इस दोहराने में कल था, वो आज भी है और कल भी रहेगा। पर यहाँ रहना कभी तो एकांत में खो जाता है तो कभी नई महफिलों का उत्थान कर बैठता हैं।
मनोज

3 comments:

रश्मि प्रभा... December 9, 2009 at 7:27 PM  

दूर खड़ा हूँ मैं अकेला, सहारे का इन्तेज़ार है ।
हर शख़्स से लड़ा हूँ, क्या यही वक्त की मार है ।
......कितनी खरी बात है , वाह

अबयज़ ख़ान December 11, 2009 at 5:23 PM  

बहुत शानदार ब्लॉग है.. और बहुत शानदार आप दोनों की मेहनत है.. मेरी ख़ुदा से दुआ है कि आपका ब्लॉग जल्द से जल्द अर्श पर पहुंचे... लेकिन ये तभी मुमकिन है.. जब आप इसका यही स्टैंडर्ड बरकरार रखेंगे...

रश्मि प्रभा... December 19, 2009 at 12:52 PM  

इस तराने के हर अल्फाज़ दिल तक उतरे.......वक़्त को सही उतारा

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