खासियत ही पहचान है।

खान-पान मे पुरानी दिल्ली किसी से पीछे नहीं है। शाकाहारी, मासाहारी, नाश्ता, चखना, सेहरी कई प्रकार के खान-पान से सजी पुरानी दिल्ली अपने आपको और भी लुभावक बनाए रखता है।
आते-जाते लोगो को ये जगह इतनी लुभावक लगती है कि बिना चखे आगे बढ़ने का मन नहीं करता और कोई जब चखने बैठ जाता है तो बिना पेट भरे उठा नहीं जाता।

यहां की लज़ीज़ बिरयानी और तरह-तरह के नामों से मशहूर नहारी अपनी खास पहचान बनाए हुए है पर यहां मासाहारी लोगों को ज्यादा भाता है क्योंकि जैसे लोग वैसा पकवान कहीं तीखा तो कहीं मीठा, पनवाड़ी के ठिए-दुकानों से लेकर रेड़ियों तक का माहौल रुकने-ठहरने का आमंत्रण एसे बाटते हैं जैसे कोई चुम्बक-चुम्बक को खैचता है।

इन सब चीज़ो, माहौल में आकर्षण अपना खैल रच रहा है जिसकी समझ बहुत गाढ़ी है। नऐ चेहरों को ये बहुत देर से समझ आता है पर धीरे-धीरे बितते समय में चीज़े छटती जाती है कुछ मन भावक तो कुछ पराई होकर रेह जाती है लेकिन चीज़े, स्वाद और चलते बाज़ार अपनी पकड़ को बनाए रखते हैं और इनको वो पकड़ देता है यहां का माहौल जो चाहता है कि एसी चीज़े टाइम-बे-दाइम बरकरार रहें जिससे पुरानी दिल्ली की पहचान में कोई बदलाव न आए क्योंकि जगह की पहचान ही जगह का वजूद बनाती है।

वक्त-बे-वक्त बनते गुच्छों की रचनाऐं इस जगह को रचनात्मक बनाए रखती है। सीधी रस्सी की तरह दिखती यहां की रोज़मर्रा में कई एसे बल हैं जिसे दूर से देखकर परख पाना मुश्किल है इन बलों की परख उन्हीं को है जो इस जगह को रचते हैं।


सैफू.

5 comments:

jamos jhalla August 10, 2009 at 6:47 PM  

Are huzoor rassee ke balon ko bhee to kholiye beshak aahistaa aahistaa.kharaamaa kharaamaa.
jhalli-kalam-se
angrezi-vichar.blogspot.com
jhalligallan

ishaan August 11, 2009 at 1:38 PM  

hi saifu,

ye parkh kya hai dost?
ye to hm janna chaenge... thoda to btaiye....

wese ek bat khe hum... hume sirf wo khane ke adde nahi dikhte... wahan kuch khaas he... wo khaas kya he?
use ubharna hi to chalange he dost....

moni August 12, 2009 at 2:51 PM  

apki bazar dekhni ki najar peni he. pehli bar maine ese bajar ko dekha he. maza a gaya.

मस्तानों का महक़मा August 13, 2009 at 1:06 PM  

dear ishaan ji..
hum apne aas pass ko jab likhte hai to uske kitne hi pahluo se hum wakif hote hai. or ese hi kitni hi rachnao ko me pesh kar chuka hun aapke bich, aage bhi purani dilli ki khasiyat par likhta rahunga jisme kitne hi chehro, mehfilo, jagaho se aap wakif hote rahoge... bas aapse ese hi samwaad ki ummid karta rahunga ... jisse mujhe bhi chalange mile. :-)

रंजना [रंजू भाटिया] August 13, 2009 at 7:50 PM  

पुरानी दिल्ली का सही चित्र ब्यान कर दिया आपने ..बढ़िया लिखा है आपने वहां के बारे में

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