रास्ता अभी बाकी है।

चहरा लटकाए मैं अपने आपको कोस रहा था। इधर-उधर देखा कोई नहीं दिखा तो अपने आपको ही देख लिया। काश कोई दिख जाता तो सकून तो होता कि इस तन्हा रात में मैं अकेला नहीं हूँ।
पर मैं अकेला ही था, न अपने आपसे बातें करने का मन था और ना ही किसी ओर से पर फिर भी किसी को देखने की आस थी जो मुझे इस अकेलेपन से बाहर खींच सके।

लेकिन मैं अपने आपको क्यू कोस रहा था ? सिर्फ़ इस वजह से कि मेरा रास्ता अभी और भी है, और मैं चल रहा हूँ। न भागता हूँ और न छलांग लगाता हूँ, कहीं टकराता हूँ तो गिर जाता हूँ एक बार नहीं कई बार और जिस चीज़ से मैं बार-बार टकराता हूँ तो उसे लांगता क्यू नहीं?
सवाल तो कई लाई है ये रात पर जवाब नही लाई, अपने कालेपन के साथ-साथ मेरे जवाबों पर भी काली परते चढ़ा रखी हैं इस रात ने।

बार-बार आस-पास का संनाटा मेरे कानों में आकर सिमट जाता और मैं फिर एक बार घबरा जाता ये सोचकर कि
" काश कोई और भी होता इस रात में। "


सैफू.

3 comments:

jamos jhalla July 3, 2009 at 7:40 PM  

eklaa chalo eklaa chalo eklaa chalo re.

ishaan July 4, 2009 at 3:19 PM  

jo jina chahte he raat ko wahi tanha niklte hain rasto par... aap rat ke humsafar bnte hain phir aap akele kahan hain?

kadam na dagmgaaye to raste bhi nahi behkte...
aapko darr aaspaas se nahi apne andar se he...

us andar ko apna hath bdakr apne sath beh nikliye phir dekhiye kya maza he jine or akele jine me...

मस्तानों का महक़मा July 7, 2009 at 2:48 PM  

bahut khoob ishaan ji...
aapne mujhe apne aapse jhoojhne ke liye kuch to diya me aasha krta hun ki aap ese hi mujhe aage bhi nayi soch ke bahawo me utarenge.

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