"तबलची"



साबिर भाई छोटी उम्र से ही तबला बजाते आए है, कई तरह की कव्वाली प्रोग्रामो और ढेरों मुशाएरो मे अपने तबले की थाप से अपनी पहचान लोगों के दिलों-दिमाग मे उतार चुके है। जिसके बारे मे अक्सर वो बताते भी है और अपने संकलन से कुछ न कुछ उठा कर सुनाते भी रहते है। उन्हे अपनी बजाई हर ताल को सुनना और सुनाना अच्छा लगता है क्योंकि अब सिर्फ सुनने की ही ताकत रह गयी है उनके शरीर मे और सुनने की लालसा।

दीवार के एक कोने मे लटका उनका सबसे बेहतरीन तबला और उसके नीचे दराज़ मे भरे उनके छोटे-बड़े, टूटे-फूटे पुराने धूल जमे तबले, इससे एक बात तो साफ हो गयी के आज भी वो अपने हाथो को सकून देने की नहीं सोचते, तबला बजे या न बजे उसे अपनी कुंडली मे दबा वो अपने हाथों की खुजली तो मिटा ही लेते है, इसी बहाने वो अपने तबले पर जमी धूल को भी साफ करते रहते है।

तबला बजाना उनका पैदाईशी हुनर है, बचपन मे ही उन्हे तबलची नाम दे दिया गया था उनकी आदतों और हरकतों की वजह से, उनकी उंगलिया जिस किसी भी धुन को सुनले तो उंगलिया खुद-ब-खुद हरकत करने लगती है यहा तक कि अगर कोई भी युही बैठा गुनगुना रहा हो तो वो हल्की-हल्की धुन मे ताल छेड़ देते है।

अमुमन हम देखते है कि जिस किसी को भी अपने हुनर मे महारत हासिल होती है वो अपने शर्म के पर्दे अक्सर ऊपर चढा कर रखता है क्योंकि हुनर मे अपने आप को ज़ाहिर करना ही महफिल मे छा जाना होता है कहते हेना : जिसने की शर्म, उसके फूटे कर्म...

उनका कहना है कि वैसे तो उनकी शागिर्दी मे उस्तादों की कमी नहीं है लेकिन उनको तबला सिखाने वाला, उनको ताल की समझ देने वाला, उँगलियों के कंट्रोल को सिखाने वाला कोई नहीं था। जब किसी ने कुछ सिखाया तो हर बार एक नयी ताल को जोड़ना सिखाया, धुन को उठाना सिखाया, गीत से जोड़ना सिखाया और ऐसे ही सीखते-सिखाते उनके सामने एक महफिल जमने लगी, मुलाकाती चहरों मे एक डिमांड दिखने लगी।

धीरे-धीरे लोग अब उन्हे और उनके शौकियाने मिजाज को भी पसंद करने लगे थे क्योंकि उनकी आदत थी- उठती हुयी आवाज़ मे दम भरना और थमते हुये आगाज को अपने फनकार से सजा देना, उन्हे शुरू से ही माहोल पर छा जाने का बहुत शोक था क्योंकि वो अपने स्कूल या यार दोस्तों मे भी जब ताल छेड़ते थे तो सबकी वाह-वाही और तालियों की गूंज सुनकर अक्सर उन्हे बहुत अच्छा लगता था जिससे की उन्हे अगली बार कुछ नया सीखने और पेश करने के लिए नयी तैयारी करने का मौका मिलता था...

घर आकर वो फिल्मी गाने सुनते या पापा की जमा उन सीडियो मे से कई एसे क़व्वालो की कवाली सुनते जिसमे कई मर्तबा उनके अब्बू ने भी काम किया था और सुनते-सुनते एक बार अपने ज़हन मे रट्टा मार लेते और उसमे खो जाते जिससे की उनके तबले की आवाज़ और मन की आवाज़ के बीच कोई गेप नहीं बचे। होठों के हिलने से लेकर उँगलियों के हिलने तक का एक अच्छा ताल मेल बना लिया करते थे।

उस वक़्त मे तबला बजाना एक हुनर वाला काम माना जाता था बचपन मे यार-दोस्तों के घर मे जब कोई पार्टी वगेरह होती थी तो घर वाले ज़ोर-ज़बरदस्ती करके उनसे माहोल बनाने को कहते- कहते की तुम बजाओ हम सब गाएँगे।

महफिल मे अपने होने की वजह को वो लोगों के चहरों और उनकी लचीली बातों मे टटोलते और सबको खुशी देने के लिए अपनी उँगलियों को तैयार करते और पास पड़े किसी भी बाल्टी-भगोने को अपनी पैरो की कुंडली मे दबा शुरू हो जाया करते,

उनको पता होता था कि इस तरह बाल्टी-भगोने बजाने से वो अपनी उँगलियों को सिर्फ थकाएंगे और कुछ नहीं लेकिन माहोल की गर्माहट और परिवार वालों की गुजारिश उन्हे इस तरह समा बांधने पर मजबूर कर देती थी। एक तरफ औरतों की आवाज़ मे धीमी धीमी सी लेय उठती और दोसरी तरफ उनकी उंगलिया थिरकती और जैसे ही सबकी आवाज़ एक साथ गूंज बन कर एक दूसरे के चेहरे पर किलकारी लाती वैसे ही उन्हे तेज़ी देने के लिए उनका थरथराना ज़ोर पकड़ लेता, डब्बे-बाल्टी-भगोने से ढ़ूम्म-ढ़म-धीन,धड़ाम-ठक-ठुक-टक-पिट आवाज़ चाहे कैसी भी हो कोई फर्क नहीं पड़ता बस उस मजमे से उठती आवाज़ के साथ एक संतुलन बन रहा हो।

लोग सिर्फ मज़ा चाहते है जिसे देने की तमन्ना मे उन्होने हमेशा कोई न कोई दिलचस्प धुन को या अंदाज़ को अपनाया और पेश किया, सबको अगर मज़ा आया हो तो तालियाँ बजा कर उन्हे फिर एक बार कुछ नया करने का मौका ज़रूर दें....

एक तराना अपना भी...

वक्त में बनते तरानों में एक तराना अपना भी...

कहते हैं किसी की नज़रों में जगह बनाने में काफी वक्त लगता है। पर नज़रों से गिरना क्षण भर का काम है। एक छोटी सी बात कब आपके दामन पर दाग लगा दे ये ना मैं जानता हूँ ना आप... । ये दाग भी कोई आम दाग नहीं होता जो किसी भी आम साबुन से धुल जाये ।इन्हें मिटाने के लिऐ फिर से अपने अतीत को दोहराना ( जैसे शब्दों का सामना करना ) पड़ता है। उसमें भी जगह की मंज़ूरी पर ही आप वहां के महौल का एक हिस्सा बन सकते हैं। "अगर नहीं" तो क्या? आप फिर लग जाते हैं नई जगह की तलाश में...

कभी-कभी आपकी निर्भरता भी दूसरों से कटने (अलग होने) की वजह बन जाती है । लोग परेशान हो जाते हैं दूसरों को अपने पर आश्रित पाकर । वो अलग-अलग चलन अपना कर आपको अपने में से काटना चालू कर देते हैं। तब उनकी हज़िरी भी आपके लिये विलोमता की गहराइयों में खो जाने का ज़रिया सी लगने लगती हैं, जिसमें लोग मिलकर भी (अलग होने) डगमगाने लगते हैं । और दुरिया नापते चले जाते हैं ' बहुत दूर '...

हम तो ठिकानो में ही रुके । पर मिला ना कोई।
जो रूठा है हमसे ।उससे शिकवा-गिला ना कोई ।

अक्सर बैठे-बैठे ये गाना गुनगुनाने लगता हूँ।"ये गलिया ये चौबारा, यहां आना ना दोबारा, अब हम तो भए परदेसी कि तेरा यहां कोई नहीं...” लगता है जिसे मिलना है, वो काफी दायरों में जा बसा है । जिसमें जाना मेरे लिये आग और पानी का खेल है। कभी-कभी सोचता हूँ कि जा लड़ूँ दीवारो से और मिटा दूँ उन कतरों को जो दूर हैं मुझसे या होना चाहते है, पर एकांत का मंज़र हमेशा रात के अंधेरो में चमकता रहता है। जो दूर रखता है मुझे मेरे उन साथियों से जो मिलकर भी अनदेखा कर देते हैं मेरी प्राथमिक़्ता को ।

दूर खड़ा हूँ मैं अकेला, सहारे का इन्तेज़ार है ।
हर शख़्स से लड़ा हूँ, क्या यही वक्त की मार है ।

लोग मिलते हैं और मिलकर खो जाते हैं। अपने बन कर अपने को ही छोड़ जाते हैं। जिसमें बचता अकेला ' मैं ' है जो घूमता रहता है एक अनजानी तलाश में । कितनी ही संभावनाएँ लिये यह कितने ही ठिकानों को पार कर बैठता है।

चाय की टेबल, भाप देती केतली, काँच के गिलास को धोते हाथ, एक कोने में पानी के टूटे गिलास, चार लोगों की बातें सुनती दीवारे, नेटवर्क ढूँढते मोबाइल, बैठने पर चरमराती कूर्सियाँ, अलमारी बना दी गई फ्रिज़, लोगो को रुख़सत करती दीवार घड़ी, सब वेसा ही हैं बस बदला जो हैं वो हूँ मैं, जिसमे वक्त अपना चक्र चला चुका है । जो समेटता जाता है अतीत को और रोशन करता है वर्तमान, जिसमें दोहराना अपनी जगह बनाए हुए है । जो इस दोहराने में कल था, वो आज भी है और कल भी रहेगा। पर यहाँ रहना कभी तो एकांत में खो जाता है तो कभी नई महफिलों का उत्थान कर बैठता हैं।
मनोज

सहर की अज़ान



बरकती महीने की इस छाव में हम कितनो की तादात मैं निकल पड़ते है एक मजमा लगाये कि कही तो कोई है जो सुनता है, देखता है, दुःख से निजात और खुशिया देता है... ये सब बाते, किस्से तो हम रमजान के अलावा भी जानते है कि हमारे बीच या हमसे जुदा कोई है जो करता-धर्ता के परिचय से हमारे बीच मुखातिब रहता है.

लेकिन रमजान को मुबारक महिना इसलिए ही कहा गया है कि इस महीने खुदा और इंसान के बीच का फासला कम हो जाता है जिस तरह निगाहें इशारा समझ लेती है उसी तरह इस मुबारक महीने में हर मुसलमान पर बरकतें नाजिल की जाती है मानता हूँ कि रमजान हमे ये मोका देता है कि हम इस वक़्त का फायेदा उठाये और उससे माफ़ी मांगे....
लेकिन अगर आम दिनों या त्योहारों पर खुदा की तिजारत की जाये तो खुदा नाराज़ नहीं होता वो और खुश होगा कि देखी मेरे बन्दे कि नियत ,,, खैर खुदा, खुदा है और बंदा तो बंदा ही है जो मैं और तू के इस खेल में जी रहा है खुदा अपने को तू के तहज़े में सुनना पसंद करता है और बंदा बात करता है तमीज़ और शराफत की,,, ये है खुदा की खुदाई.
दोनों ही खुदाई की पैरवी में लगे पड़े है वो बोले मुझे सुनो तो वो कहे की अरेरेरेरे मुझे भी तो सुनो मैं खुदा नहीं तो क्या हुआ सुनाने के लिए कुछ तो लिए हुए हूँ. दोनों की आवाज़ में कोई फर्क नहीं है कोई भेद नहीं है लेकिन अगर देखा जाये तो अज़ान और गाने की आवाज़ के बीच में सिर्फ सोच का फर्क खड़ा होता है ... कि आवाज़ हमे कहा बुलाती है मैखाने या मस्जिद ?
सुबह कि पहली आवाज़ जो रात के ख़त्म और सुबह के होने का आगाज़ रखती है वो पहल है सहर की अज़ान की जो रोज़ एक ही अंदाज़ लिए हमारे कानो तक आती है और फिर लोट जाती है अगली नमाज़ के इंतज़ार में


आवाजों का साया..


बहुत पुरानी बात है लोगों की कहानियों में ये पुरानी बात आज भी ताज़ा हो उठती है और अगर महसूस किया जाये तो छन-छन की उस आवाज़ का साया हमारे आस-पास मंडराने लगता है।


दरअसल ये आवाज़ पिछल-फैरी के आने की होती थी, लोग अपने बंद दरवाज़ों से ही उसके अपने आस-पास होने का अनुमान लगा लिया करते थे. जो पिछल-फैरी के होने का वजूद हुआ करता था उसकी छन-छन चलने की आवाज़ लोगों के मन में दहशत पैदा करती थी और अगर दादा-दादी की कहानियों में उसे सुने तो बखूबी उस छवि का भी जिक्र किया जाता है कि वो दुल्हन जैसे कपडे पहने होती है, अपने बड़े से आकर के साथ उसकी पायल की आवाज़ कानों में ऐसे गूंजती है जैसे उससे भरी आवाज़ कभी सुनी ही न हो, वो लोगों को बहकाती है, आकर्षित करती है, बहकी-बहकी आवाजों से मदद का वास्ता देकर अपने पास बुलाती है।


ऐसे में उसकी आवाज़ जो दिमाग पर कब्ज़ा कर लेती है उससे कई लोग मारे भी जाते है. लेकिन उसका होना और न होना ऊपर वाले की बनायीं इस कुदरत से ही चलता है दिन में चलती इन तंग गलियों में जितना शोर होता है उतना ही रात के साये में ये गलियां गुप्त अंधेरो में खो जाया करती हैं और जिस तरह अँधेरा अपने आप अपनी जगह बनता है उसी तरह ये छवियाँ भी उसी के बीच अपना वजूद पक्का करती हैं।


ऐसे में उसके दिखने को लेकर इतनी चर्चा नहीं रही जितना की उसकी पायल की छन-छन-छन आवाज़ का डर लोग अपने दिलों में लेकर जीते हैं.

Night show.


ये बात तो अब रोज़ रात होते ही शुरू हो जाती है. कौन समझाए ? कौन कहे इनसे कि आस-पास बहु-बेटियों का घर है ?

यहाँ तो कोई कहने-सुनने सुनने वाला ही नहीं है, रोज़ाना मजमा लगवाना इस आदमी का काम बन गया है.
शीतल जी के घर के नीचे रोज़ पड़ोस के रमेश भाई पीकर हल्ला मचाते हैं, रत के बजे नहीं के शीतल जी का अपने घर की गेलरी से इस तरह का बडबडाना शुरू हो जाता है.

रमेश भाई रोज़ एक ही बात बोल-बोलकर इलाका सर पर उठा लेते हैं- उनकी कोई एक बात नहीं सुनता लेकिन शीतल जी की बात को सुनने के लिए पूरा इलाका इकठ्ठा हो जाता है.

रमेश भाई --- तुम सब मुझे यहाँ से भागना चाहते हो , मैं यहाँ से कही नहीं जाने वाला...
शीतल जी --- जा अपने घर जा, कोई नहीं भगा रहा तुझे- अपने घर जा सोने दे हमे, हम रोज़ यहाँ तेरी गलियां सुनने नहीं बैठे है.
( वो रोज़ाना यही सोचती हैं कि वो बोले, लेकिन अब उनको भी आदत सी हो गयी रमेश भाई की तरह रोज़ इलाके को अपनी आवाज़ सुनाने की )

रमेश भाई --- हाँ तो भगा दो मुझे, मरो मुझे, ये सब मरने के लिए तो आये है , मरो ....भगाओ
शीतल जी --- चला जा, जा- वरना ये सब ही मरेंगे, फजूल में गलियां मत बका कर यहाँ आकर, ये अपने घर जा कर किया कर, मैं भी तो देखू तेरी बीवी कैसे सुनती है तुझे ?

पूरा इलाका इनकी इस बातचीत को इतने ध्यान से सुनता है जैसे कोई फिल्म चल रही हो- वैसे ये नाईट शो सही टाईम पर ही तो शुरू होता है 9 से 12 .

इस भीड़ में आस-पास के वो सभी लड़के शामिल होतें हैं जिनका काम ही है रात की आवाजों को सुनना और अपनी खिल्लियों से माहोल में गूँज बनाये रखना जिससे की इनकी मोजूदगी का एहसास बना रहे उस जगह में. वो अपनी बैठक जान-बूझ कर ऐसी जगह बनाते है जहाँ से उनकी बातें और हरकतें इलाके के बीच पहुच सकें.

जब भी इस तरह की कोई बातचीत इलाके में भारी आवाज़ बनकर गूंजने लगती है तो आस-पास के घरों की गेलरियों में लड़कियों का आना होता है जिससे ऊपर-नीचे के बीच देखा-देखी का रिश्ता जोर पकड़ता है और इशारेबाज़ी, अपनी पसंद , दोस्तों के लिए भाभी चुनना एक तरह से एक अलग ही समझ बनता है इस माहोल को सोचने के लिए की इस दोरान वो क्या-क्या है जो चल रहा है होता है, लडाई सिर्फ हक और नाहक में फस कर रह जाती है उसके बीच लुक्का-छुप्पी का वो जो खेल है वो एक मोका बन जाता है लड़के-लड़कियों के लिए जिसके बार-बार बनने का इंतज़ार रहता है.

रमेश भाई पीने के बाद एक ही बात सोचते हैं की ये सब मुझे भागना चाहते है, मरना चाहते हैं. ऐसा इसलिए होता है की जब भी वो पीकर कालोनी में इंटर होते हैं तो वो सीधे अपने घर नहीं जाते बल्कि गालियाँ बकते-बकते बिल्डिंग के नीचे ही मंडराते रहते हैं. ऐसे हालातों में उनके दिमाग को कोई भी बात मिलना- हल्ला मचने का मुद्दा बन जाता है.

लड़के अकसर उनसे ये कह देतें हैं कि --- रमेश भाई तुम्हारा पत्ता तो साफ़ है ... ये सब मिलकर तुम्हे भागने कि साजिश कर रहे हैं .
बस ये सुनते है उनकी शराबी धुन शुरू, नशे की हालत में गिरते-पड़ते वो अपना रूप धारण कर इलाका सर पर उठाने का जिम्मा ले लेते हैं.

ऐसे में उनका चिल्लाना शुरू और शीतल जी का उन्हें समझाना शुरू, वो समझते हैं और ही कोई उन्हें समझा पता है बात यही पर आकर शुरू भी होती है और ख़त्म भी यही होती है कि--- तुम सब मुझे यहाँ से भगाना चाहते हो ....

saifu...

आंतरिक उर्जा


"खुद को अकेला समझना सरासर ना इंसाफी है"

ये लाईन मैंने अपने साथियों के साथ समझी, जब मैंने ये लाइन सुनी तो मुझे इसे समझने मे ज्यादा देर नही लगी क्योंकि इस लाइन को हम अपनी जीवन में कई कठिन प्ररिस्तिथियों में जीते हैं।

इस बात को समझने के बाद मैंने हमेशा इसे अपने आप से जोड़े रखा, क्योंकि ये लाइन मेरी आंरिक उर्जा मे एक खास तरह का बहाव पेदा कर देती है। जिससे मुझे कर जाने की क्षमता का एहसास होता है।

अकसर कुछ प्रसतिथियां इस कदर घैर लेती हैं कि हम खुद से एक बहस मे जुट जाते हैं और ऐसे हालात मे एक बात साफ साफ समझ आने लगती है कि जिस पर जितने संकट मंडराते हैं वो उतना ही सतर्क और आंतरिक उर्जा का धनी हो जाता है।

वो कहते हैना :- दूध का जला छाज भी फूक-फूक कर पीता है।


एसे मे खुद को समभालना भी मुझे अपनी आंतरिक उर्जा का बल लगता है। जिससे मुझे समस्याओं से लड़ने और उन्हें समझने का भरपूर दम मिल जाता है।

कई लोग समस्याओं के दौर मे प्रार्थना करते हैं और खुद को मजबूत करते हैं, प्रार्थना करने का मतलब है खुद को कमज़ोर समझना लेकिन अगर संकट से जूझा जाए तो हमारे अंदर की आंतरिक उर्जा का बल कई गुना बड़ जाता है।

जिसकी वजह से हमे डर नही लगता और डर ना लगने का मतलब है, हम खुद के दम से किसी भी और कैसी भी समस्याओं, चुनोतियों का सामना करने को तैयार हैं।

हालात शब्द से सभी का सामना होता है, किसी का खुशी में तो किसी का गम में, हालात हर किसी को खुद के होने का एहसास कराता रेहता है लेकिन हम उसे अकसर अपनी ज़ुबा पर तब लाते हैं जब हालात ही कुछ एसे हो- मतलब परेशानियों के समय में।

हमे मुकाम कब मिलता है ?

जब हम अपने अंदर की ताकत और जुझारुपन को सामने लाते है या बाहर लाते है।

इस बात को समझने का एक और नज़रिया हो सकता है- कि जीवन के लिए जो जद्दोजहद आदमी करता है वही हमारी आंतरिक उर्जा को मनोबल देता है।

और इसे हम प्रतिरोधक क्षमता भी कह सकते हैं जो जीवन के लिए किये गऐ संघर्ष से आती है।

जब किसी पर संकट आता है तो वो रास्ते तलाशता है।

शेर पीछे पड़ जाए तो हिरन भागने की कोशिश करता है और इसी तरह हम पर भी जब समस्याऐं आती हैं तो हम बचने की कोशिश करते है।

एसे हालात हमारी अंदरुनी चैतना को दिखाते हैं और जब संकट घैर लेते हैं तो हमारी चैतना ही हमें प्रस्तिथियों से लड़ने को उत्साहित करती है।

और इस बात को हम खुद से महसूस कर सकते हैं कि संकटों मे ही हमारी आंतरिक उर्जा पोषित होती है।

सफ़र पटियाली ,

आस-पास का माहौल...


अकसर मैं अपना कुछ समय पटियाली चौराहे की चाय की दुकान पर बैठकर गुज़ारता हूँ और हमेशा की तरह वो समय रात का ही होता है 6 से 8 के बीच का जिसमे में खुद को लोगों के बीच रख पाने का समय निकाल लेता हू एसे मे तरह-तरह के लोगों से और उनके अपनी जगह को देखने के नज़रियों से मैं मुखातिब होता रहता हूँ जिससे मुझे जगह में कब, कहाँ और कैसे पैश आना है ये समझ बनती रहती है हर किसी की बात में एक नई सीख और सलाह का एतराम करना बखुबी दिमाग में बैठ जाता है और हँसने-हँसाने के साथ-साथ जगह से जुड़े किस्से और पहेलियाँ सुनने को मिलती है, एसा लगता है जैसे यहां का माहौल मुझे खुद के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा हो। चाय की दुकान का माहौल यहां के सबसे भरे हुए माहौल मे से एक है जहां तरह-तरह के लोग अपनी डेरी जमा लेते है रात के समय मे चाय की दुकान पर ही सबसे ज़्यादा रोनक देखने को मिलती है सबसे ज़्यादा रोनक का मतलब दुकान के बाहर लटका एक बेटरी से चलने वाला बल्ब जो और कही देखने को नही मिलता।


यहां रात भी तो जल्दी हो जाती है सिर्फ 7 बजे ही अंधेरा घर, गलियों, चौराहों पर अपना कब्ज़ा कर लेता है और लोग अंधेरे से चहरा छुपाए अपने-अपने घरों मे ही रहते है। जरूरत मंदो का घरों से बाहर निकलना मुनासिब है जिससे कि रात मे कोई चलता हुए दिखे तो दहशत का साया मन मे उतर आता है एसे मे या तो उलटे पैरो भागने का मन करता है या फिर अपने मन को हाथों की मुठ्ठियों मे दबाए- दुआ या राम-राम जपने का समय करीब आ जाता है।


चाय की दुकान ठीक उस जगह है जहां बसों के रुकने का ठिकाना है बस आती है रुकती है और 5 मिनट मे निकल जाती है उसके बाद घंटों का इंतज़ार क्योंकि यहां सफर की बहुत मारा-मारी है दिन में लोग यहां चलने वाली जीप गाड़ियों का सहारा लेकर अपने-अपने ठिकानों तक पहुच जाते हैं, जिसमे बहुत दिक्कत सहनी पड़ती है। यहां के अड्डे पर जीप गाड़ियां नम्बर से चलती हैं।


हर एक गाड़ी का नम्बर आता है और हर नम्बर के लिए गाड़ी को घंटो खड़ा रहना पड़ता है और जब उनका नम्बर आता है तो वो दिन की दिहाड़ी बनाने के लिए अपनी गाड़ी फुल करके चलते हैं और फुल ही नही बल्की ‌‌‌‍‌ओवर लोड करके चलते हैं। जीप के मिताबिक उसमे ज़्यादा से ज़्यादा 8 सवारी और एक ड्राइवर बैठ सकता है लेकिन यहां की जीप में जब तक 18 से 20 सवारी चड़ नही जाती वो आगे नही बढ़ती क्योंकि यहां बैठकर सफर करने का नियम नही है यहां फंसकर, खिसककर, लटककर छतों पर चड़कर सफर करने का नियम लागू है। एसा नही है कि इस सफर से लोग सहमत हैं, यहां आए दिन खिसयाते लोग ड्राइवर पर चड़ जाते है लेकिन ड्राइवर भी अपनी लाचारी सुना कर इस बहस से कट जाता है ( भाई गाड़ी चलेगी लेकिन जब तक हिसाब नही बनेगा कैसे चलाऊ, डिज़ल के पैसे, रोड के ठेके के पैसे और अपनी दिहाड़ी जब तक नही बनेगी मैं गाड़ी चलाकर क्या करूंगा, अगर किसी को जल्दी हो रही हो तो वो उतर सकता है)


यहां सफर तय करने के लिए इंतज़ार करना बैकार है क्योंकि यही एक मात्र साधन है 15-16 कि.मि का रास्ता तय करने का। अकसर लोग किलस कर उतर जाते हैं और आती-जाती गाड़ियों को हाथ देकर रोकने की कोशिश करते हैं कोई ट्रक-टेम्पों दिख जाता है तो उस पर जैसे-तैसे चड़ने का इरादा बना लेते हैं क्योंकि यहा कोई भी गाड़ी रुकने को तैय्यार नही होती क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि ये सवारी इस ठेके की है यहां गाड़ी रोकी तो ठेके के मालिक से हातापाई तक हो सकती है।


एसे में सवारी के पास कोई और रास्ता नही बचता और घिच-पिच करती इस जीप में ही सफर करना पड़ता है। मेरे साथ ये रोज़ का किस्सा है सुबह जीप की छत पर बैठकर ओफिस पहुचना और रात को टाइम से बस को पकड़ना वरना आने का कोई साधन नही है क्योंकि रात मे कोई जीप या ट्रक-टेम्पों नही चलते। पटियाली चौक पर बसें रुकने का समय – सुबह 9 बजे लोहारी खेड़ा वाली, दोपहर 2 बजे अली गंज वाली, शाम 7.30 बजे शिवारा वाली,और रात 8.30 बजे भरगैन वाली आखरी, ये सब दिशाए पटियाली से होकर गुज़रती हैं। मुझे शाम वाली गाड़ी से निकलना होता है क्योंकि उसके बाद पटियाली में वक़्त गुज़ारना बहुत मुश्किल है सड़कों पर लोग नही दिखते, बाज़ार मे भीड़ नही दिखती, चारों तरफ बस अंधेरा और उस अंधेरे मे टिम-टिमाता चाय वाले का बेटरी बल्ब और पास खड़ी एक अन्डे आमलेट वाले की रेड़ी जो उसी बल्ब के सहारे उस अंधयारी सड़क पर खड़ा है, कोई एक-आद ग्राहक आता ही रहता है जिससे उसकी कुछ घंटे खड़े रहने की हिम्मत बनी रहती है।


जैसे ही गिनती-चुनती के लोग भी घरों की तरह रूख कर लेते है वैसे ही सिमटने का दौर शुरू हो जाता है 9 साडे 9 आखरी टाइम माना जाता है जिस वक़्त कोई भी दिखाई नही देता ना लोग और ना वो टिम-टिमाता बल्ब आखिर बैटरी भी कब तक बल्ब जलाएगी वो भी कुछ घंटो तक अंधेरे से कुछ लोगों को बचाती है उसके बाद अंधेरा उसे भी अपनी चपेट मे ले सो जाता है सब के साथ।


सबके सो जाने के बाद इलाके मे लाइट आती है ठीक रात 11 बजे गिने-चुने लोगों के घरों से टि.वी चलने की आवाज़ों से ये महसूस होता है कि ये इंतज़ार में थे खुद को बोरियत से बाहर लाने के लिए क्योंकि अंधेरा सिर्फ डर ही ही नही होता। कुछ लोग अंधेरे मे खुद को उतार लेते है और सामना करते है उस ओझलपन का जिसमे कुछ दिखाई नही देता जिसमे एक छवि दम से खड़ी होती है दोनो ही जीदार है और दोनों ही एक-दूसरे को डराने का दम रखते है जिसकी हिम्मत 11 बजे तक टिक जाए वो विजेता क्योंकि 11 बजे हर घर का एक बल्ब जरूर जलता है और हज़ारों बल्ब की रोशनी के आगे जो बचा वो सकून में।


सैफू .