दिल्ली में फ़ायरिंग, 'इंडियन मुजाहिदीन' की चेतावनी

घटनास्थल















भारत की राजधानी दिल्ली में अज्ञात बंदूकधारियों ने जामा मस्जिद के गेट नंबर तीन के बाहर पर्यटकों की एक बस पर गोलियाँ चलाई हैं जिसके कारण दो लोग घायल हो गए हैं. पुलिस के अनुसार सुबह लगभग साढ़े ग्यारह बजे इस इलाक़े में फ़ायरिंग हुई और फिर हमलावर मोटरसाइकिल पर फ़रार हो गए.

इस घटना के बाद, दोपहर में बीबीसी हिंदी को भेजे गए एक ई-मेल में ख़ुद को इंडियन मुजाहिदीन बताने वाले एक संगठन ने सीधे इस घटना का ज़िक्र किए बिना 'भारत प्रशासित कश्मीर में मारे जा रहे निर्दोष लोगों का हवाला देते हुए दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में चेतावनी दी है.'

"क्या कहना है प्रत्यक्षदर्शियों का"
गोलीबारी के दो घंटे बाद जामा मस्जिद से थोड़ी दूर एक पुलिस थाने के पास एक कार में भी आग लगी. बम निरोधक दस्ते ने जांच के बाद उसमें से एक प्रेशर कुकर जैसा सामान निकाला है लेकिन इसमें भी जान माल का कोई नुकसान नहीं हुआ है.

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने शाम को बीबीसी से बातचीत में कहा कि इस घटना में घायल दोनों विदेशी सैलानी अब ख़तरे से बाहर हैं.

राजन भगत ने इस घटना में किसी चरमपंथी संगठन का हाथ होने से इंकार करते हुए कहा कि ये किसी आपराधिक गुट का काम लगता है. उनका कहना था, '' ये पुलिस को निशाना बना रहे थे. किसी चरमपंथी संगठन का इसमें हाथ नहीं लगता है.''

इंडियन मुजाहिदीन का भेजा संदेश
घबराने की ज़रूरत नहीं: शीला दीक्षित
"एज़ वी ब्लीड सो विल यू सीप.....सावधान ये अल्लाह के शेरों की पहल है. हम आपको चेतावनी देते हैं कि यदि दम है तो आप कॉमनवेल्थ खेल आयोजित करके दिखाएँ. हमें पता है खेलों की तैयारियाँ चरम पर हैं. सावधान ! हम भी आश्चर्यचकित कर देने के लिए पूरी तैयारी कर रहे हैं..."


बीबीसी को भेजे ईमेल में जामा मस्ज़िद के पास हुई घटना का ज़िक्र किए बिना कहा गया है - "अल्लाह के नाम पर, हम ये हमला आतिफ़ अमीन, मोहम्मद साजिद को श्रद्धांजलि के रूप में पेश करते हैं..."

पाँच पन्ने के ई-मेल में कहा गया है - "एज़ वी ब्लीड सो विल यू सीप.....सावधान ये अल्लाह के शेरों की पहल है. हम आपको चेतावनी देते हैं कि यदि दम है तो आप कॉमनवेल्थ खेल आयोजित करके दिखाएँ. हमें पता है खेलों की तैयारियाँ चरम पर हैं. सावधान ! हम भी आश्चर्यचकित कर देने के लिए पूरी तैयारी कर रहे हैं...."

ग़ौरतलब है कि दिल्ली में दो हफ़्ते बाद राष्ट्रमंडल खेल शुरु हो रहे हैं और राजधानी में अनेक विदेशी नागरिकों के पहुँचने की संभावना है.
इस घटना के बाद दिल्ली में तनाव फैल गया है और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने लोगों से शांत रहने की सलाह दी है. दिल्ली और मुंबई महानगरों में हाई एलर्ट की घोषमा कर दी गई है.

जो लोग घायल हुए हैं वे दोनों ताईवान के नागरिक हैं. वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में भर्ती हैं और ख़तरे से बाहर हैं. गृह मंत्रालय और सुरक्षा बल सतर्क हैं और पूरे मामले की जाँच चल रही है. लोगों को घबराने की ज़रूरत नहीं है, सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी की जा रही है
"मुख्यमंत्री शीला दीक्षित"

फ़िलहाल दिल्ली के प्रशासन और पुलिस ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि ये चरमपंथी घटना है या नहीं. दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने फ़िलहाल इस घटना के किसी तरह के चरमपंथ से जुड़े होने की बात नहीं कही है.

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा है, "जो लोग घायल हुए हैं वे दोनों ताईवान के नागरिक हैं. वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में भर्ती हैं और ख़तरे से बाहर हैं. गृह मंत्रालय और सुरक्षा बल सतर्क हैं और पूरे मामले की जाँच चल रही है."

'राष्ट्रमंडल खेलों में सुरक्षा तगड़ी'

"संयुक्त पुलिस आयुक्त करनैल सिंह"
दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त करनैल सिंह का कहना है, "मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों ने सात-आठ राऊंड फ़ायरिंग की है. इन्होंने रेन कोट पहन रखे थे. घटनास्थल से गोलियों के चार छर्रे बरामद हुए हैं. इस घटना में दो लोग घायल हुए हैं. मामले की जाँच चल रही है."

जामा मस्जिद के शाही इमाम बोखारी ने एक टीवी चैनल को बताया, "लगभग साढ़े ग्यारह बजे वे गेट नंबर तीन के दरवाज़े के बाहर थे जब मोटरसाइकिल पर सवार लंबे कद के दो नौजवानों ने स्टेन गन से फ़ायरिंग की. जब उन्हें एक व्यक्ति ने चुनौती दी और उनके पीछे भागा तब वे इलाक़े से भाग निकले."

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/09/100919_delhi_firing_as.shtml

एक नज़र

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गुज़ारू अपना आज किसी सपने में सजा कर
उतारू अपने आप को किसी आईने में बसा कर
निकलु मैं भी एक दिन उड़ने की तमन्ना लिए,
चलु मैं भी एक दिन खुद को भीड़ बता कर...

जिंदगी के लम्हातों से पूछु अपना हाल बे-हाल बता कर
सीखू उससे जीना सुर-ताल लगा कर.
सुनाऊ कोई सपना, अपना कोई पल छुपा कर,
और पूछु अपने कल से अपना कल बता कर.


सैफू


माफ़ी
चाहता हूँ दोस्तों इतने लम्बे समय तक आपसे दूर रहने के लिए.

इसकी एक ख़ास वजह है मैं उ.प में एक प्रोजेक्ट से जुदा हुआ हूँ जिसके लिए मुझे यही पर अपना समय देना पड़ता है, यहाँ पर मैं खुद की कोशिश से एक लैब बना रहा हूँ जिसमे लोकल लोगो की शिरकत से ही मैं जगह की बसावट में उतर सकता हूँ,
यंग राईटरस के साथ काम करना और उनकी उत्तेजनाओ को संभवता के पायेदान तक लाना मेरा काम है जिससे की वो अपने कल में आज के इस समय को दोहरा सके उनकी रचनाये उनको एक पहचान दे सके... कोशिश है समय को दोहराने की, बनने से बनाने तक को सोचने की वो ख़ास जगह जहा लड़के-लडकिया खुद से खेल पाए, सोच पाए उस खेलने को, लिख पाए उस सोचने को और दिखा पाए अपने लिखे हुए को समाज और शेहेर की घिच-पिच करती भीड़ में.
ये एक कोशिश है अपने साथ भी और जगह के साथ भी कि क्या कोई एसी जगह अपने रंग में लोगो को रंग सकती है ?
क्या सपनो को दीवार पर सजाया जा सकता है ?
क्या कल्पनाओ को बाज़ार में सुनाया जा सकता है ?
क्या खुद कि नज़र से देखे उन लम्हों को ओरों कि नजरों का हिस्सा बनाया जा सकता है ?

एसे कई सारे सुझाव और सवाल दिमाग में पहरे देते रहते है लेकिन उनको हकिकत की शक्ल देने में एक लम्बा समय चाहिए वो लम्बा समय बार बार ये एहसास दिलाता रहेगा की वक़्त के बदलते काटो के साथ अगर खुद को बदलने की ज़िद भी जुड़ जाये तो उन बदलते पलों में, मैं खुद को भी पाउँगा . और समय यही चाहता है की सबको उसकी रफ़्तार से चलना चाहिए जो छूट गया वो कल वापस नहीं आएगा और अगले कल में खुद को देखना आपको काफी पीछे छोड़ देता है.

लोग कहते है कछुए की चाल में आलस कम होता है तेज़ भागने से आप कही जाकर रुक जाते हो जहा जाकर आप पीछे छूटने लगते हो...
ये सोचने वाली बात है की जीवन रचना की रफ़्तार क्या होनी चाहिए ?
मुझे लगता है कि समय हर घडी हमे ये महसूस करता है कि हमे किस रफ़्तार से चलना चाहिए, हर मोड़ पर संभलने के संकेत देता नज़र आता है समय.
वक़्त-बे-वक़्त बनते किस्सों में आपको शामिल होने के न्योते देता है तो कभी पिछले किस्सों से मिली नसीहतो को सामने ले आता है और रफ़्तार पर असर छोड़ता है.

ये एक धारणा हम सबके दीमाग में रहती है शायद आपकी धारणा कुछ और हो लेकिन मेरी सोच और मेरे ख्यालात यही कहते है की हमे वक़्त की रफ़्तार से कुछ सीखना चाहिए उसकी गति धीमी ज़रूर है मगर बदलते समय में वो खुद को तरह-तरह से ढाल लेता है - जब लोग कहते है - "यार आज दिन का पता ही नहीं चला, कब खत्म हो गया" या "यार इतनी देर हो गई बेठे-बेठे लेकिन समय है कि कट ही नहीं रहा".
ये समय के अपने कुछ ढांचे है जो हमारे साथ तरह-तरह से जीते है लेकिन फिर भी लोग उसकी गति और बदलते रूप से कुछ सीच नहीं पाते, अपने बड़े-बुजरूगो से कहावत के नाम पर सीख का पाठ ज़रूर रट लेते है लेकिन समय के साथ चलना नहीं सीख पाते . शायद में भी आज ही इस गति को सोच रहा हूँ आज से पहले मैं भी इस रफ़्तार से ओझल था जो रोज़ मेरे साथ जीता है में उसी को नहीं सोच पा रहा था.

आगे से हम सब समय कि रफ़्तार को सोचेंगे और उसके साथ आगे बदने कि नीति को अपने जीवन में अपनाएंगे
हमेशा खुद को आगे के लिए तैयार करना है, हर बार आगे बड़ने को सोचना है जीवन भी आगे बाद रहा है समय भी आगे बाद रहा है तो हम क्यों ठहराव में जीए ये हमारी ज़िद होनी चाहिए तभी एक नया सपना पूरा होता दिखाई देगा ----



सैफू .

ढेरो गड्डे

वो पल जो वक्त की रफतार को पकड़ने की कोशिश में उसे तेज़ कर खो बेठता है अपने अतित को। तलाश जो अपनी दिनचर्या में खुद की मैं गाथा को कही अंधियारे कमरे में ओझल करती जाती है। मगर हम फिर भी अपनी वो खुदाई खत्म नही करते इस उम्मीद मे की हो सकता है जीत जाऊ ? कही ना कही उस अनमोल खज़ाने की तलाश में लगे रहते है और ढेरो गड्डे खोदते चले जाते है अपने सफर को इतिहासिक बानाने की कोशिश में।

एसा लगता है कि एक चिरग की रोशनी दूर से सब साफ दिखाने में सब मटमेला करती जा रही है । उस में भी आँखे तलाश रही है अपनी दूरी के सफर को जो कही छोटा होने के बावज़ूद भी बहूत लम्बा लग रहा है ।

ना जाने कितनी परछाईयो को पार करना पड़ता है ।और कितनी अनदेखी अफवाऔ को मानना पड़ता है । क्योकि सफर हर बार मिलता है एक नई छवी के साथ जो उसे छिलती नोचती और पी जाती । पर पीना भी अधुरा होता क्योकि कुछ ना कुछ झुटन तो बच ही जाता है।वो ही झुटन किसी मेजिक बॉक्स की तरहा फिर भर जाता जो परोसा जाता किसी नए के सामने अपने नए स्वाद के साथ। फिर क्या ? लग जाते है इसे एतिहासिक बनाने में। सब कुछ ओखली में ड़ाल कुटने लगते है एक नए मिक्शचर की उम्मीद के लिए।

फिर भी याद आता है अपनी दुरीयो का नापा वक्त जो अपने बने ढाचो में कही छिपा हमे ही तकता रहता है। वो दिवार पर लगी घड़ी जो अपनी दूरी को नापने के लिए सब गिनती जाती है ओर अपनी धड़कन से अपने होने की मोज़ूदगी का एहसास दिलाती। और कहती कितने दिन हुए । चलो आज फिर साथ मिलकर अपनी बातो में मुझे खोने दो ।

वो चाय के खाली गिलास आज भी इसी उम्मीद में रखे दिखाई देते है कि आज तो कोई मण्डली हमारे साथ अपने सफर को बाँटे और हमारी गरमाई में इस गर्म माहोल में मिठास मिलाए। पर वो मिलना भी उसे पता है बटना ही था तभी खामोश होकर उन बिखरे दानो को बस देखने का ही काम करते। आज वो सफर मे तय हुआ वक्त धुंधला है या गायब पता नही। पर कुछ है जिसकी उम्मीद है।

पता नही क्यो हम अपनो से ही कटने लगते है। अगर पुछो तो कभी समय नही मिलता कहते है या काम में व्यस्त है कहकर अपना रास्ता नाप लेते है सफर के रास्तो में उन को धुंधला करते चले जाते है । फिर भी तैयार रहता है अपना एतिहासिक पन्ना हर किसी को सुनाने के लिये ।

कभी-कभी हम खुद को इतना ज़ाहिर कर देते है कि किसी ओर की मोज़ूदगी भी हमे फीकी सी लगती है। फिर निकलते है हम अपने सफर की तलाश में। वो ही सफर हमारे लिए एक सवाल बना रहता है। कि किस सफर को हम तलाश रहे है ? वो सफर क्या है- जो हमारी रोजर्मरा की जिन्दगी में अपने होने की छाप छोड़ जाए और आए दिन अपने होने को हमारे लफ़्जो के साथ हमारे अपनो में बोंते
मनोज

दोतरफा



दोतरफा शब्द हमेशा एक पहलू पर धुंधला पर्दा डाले रखता है जिसके आकार और ढ़ाचें की गणना समान होती है लेकिन रचना और भाषा की समझ पहले पहलू से बिलकुल अलग होती है। जीवन में एसे कई पहलू हमें एक धुंध में रखते हैं जिसमें दूसरे पहलू का मोल जीवनता से हमें ये आभास कराता है कि कुछ पहलूओं का धंध में रहना ही जीवन की गणना है। सच और झूट के खेल में हम हमेशा दोतरफा की बहस में रहते हैं कि कुछ तो एसा होगा जो पोल-खोल के इस पहलू से हमें एक सीधी नज़र दे सके जो कि एहसास और विश्वास के दम पर रचा जाता है।

अपने तर्क को हम सहमती के अहसास में उतार लेते है जिसको लेकर कभी समाज तो कभी सत्ता अपने तर्क के साथ हमारे बीच पेश आते हैं, तब हर एक तर्क के वज़न का एहसास कई पहलूओं की धूंध को साफ करता दिखता है जिसमें खुद की समझ से बहस करना और दूसरे पहलू को नकारनें के साथ-साथ सोच पाना मुश्किल हो जाता है।

कुछ ही दिनों पहले की बात है गली में रिया और शेहज़ाद के घर से भाग जाने की खबर से सब की बातों का एक किस्सा उनके भाग जाने से जुड गाया। सबकी बातों में सही और गलत को लेकर चर्चा थी कि सही है तो कैसे? गलत है तो क्यूं ? मज़हब को भूल कर भाग कर शादी करने वाली बात पर कूटनीती का सिलसिला आपसी बातों में घुसता जा रहा था मगर अहसास के साथ जुड़े उस रिश्ते को सोच पाना सबके लिए अपनी समझ के आगे फीका था।

ठैस पहुचना, रिश्तेदारों को जवाब देना, मर्यादा को लांगना और मर्ज़ी जैसे शब्द को समाज के बीच रख पाना ही उस पहलू के तर्क पर टिके रहने की बहस थी। लेकिन अपने खुद से, अपने समाज से झूझ के जिस रिश्ते की नीव रखी गई है उसे अगर सोचा जाए तो दूसरा पहलू कुछ और ही कहता है उस पहलू का तर्क सिर्फ अपनी सहमती के अहसास से भरा है जिसके साथ सदा से समाजिक बहस जुड़ी हुई है। कभी- कभी हम खुद को सहमती में लाने के लिए अपनी सोच को कही रोक देते है एसे में इस मुद्दे पर रिन्कू हसते हुए बोला :- सबकी जोड़ी वो ही बनाता, भाग्य विधाता।

उसकी इस बात ने समाजिक सोच और नियम को कोई धक्का तो नही दिया लेकिन उस धक्के के जोर को कम जरूर किया जिस धक्के को सोचकर वो किस्सा चर्चित था।



सैफू.

कोरियर बॉय...

पहला दिन बड़ा ही थका देने वाला था गर्मियों की छुट्टियों में शहर की दौड़-धूप के बीच उतर पड़ा था मैं।
ओफिस से मिला एक काला बेग और कुछ पैकेट, जहां से मुझे वो पैकेट उठाने के लिए कहा गया था उस ड्रा नीचे लिखा था चाँदनी चौक और आस-पास दरिया गंज, दरीबा, जामा मस्जिद...

मुझे चाँदनी चौक के लिए चुना गया था और हर पैकेट को पहुचाने के बाद स्लिप पर साइन करवा कर वापस लाने को कहां जिससे की मेरे काम को गिनतीयों में उतारा जा सके।

कुल 16 पैकेट और 16 गलियां, 16 पतें और 16 अलग-अलग आस-पास की पहचान कहीं गली के पास स्टेट बैंक ओफ इंडिया तो किसी गली के बाहर साबरीन मस्जिद किसी गली की पहचान पुराने प्याउ से तो किसी गली को फाटक से नवाज़ते लोग।

पतों की खोज और पहचान करते-करते शहर के कुछ हिस्सों को एसे देख रहा था जैसे शहर में कोई अजनबी आया हो, कोरियर का काम शुरू करने से पहले मेरे दोस्त ने ये सलाह दी थी कि "काम मुश्किल नही है मुश्किल है तो जगह की पहचान होना ।"


सैफू.

" स्ट्राईकर "


हमारे बीच कुछ चीज़ें, सवाल, बातें और खेल कुछ हद तक हमारी रोज़मर्रा से समय को खींचते नज़र आते हैं। और वो खींचाव कहीं न कहीं किसी पड़ाव की तलाश में घूम रहा होता है। कैसे कोई संसारिक मुहावरों में जीने लगता है और ज़िन्दगी के पहलूओं पर एक खास नज़र बनाता है कि इस बाग-दौड़ में जिया कैसे जाए?
अकसर हम ये महसूस करते है कि जिंदगी एक कतपुतली के खेल की तरह है उंगलियों के इशारे हम बखुबी समझते है लेकिन स्ट्राईकर इस भुमिका में जीकर भी दुनिया से ये सवाल नही कर पाता क्योंकि जीवित और निर्जिव का फर्क सोच पाने के पहलूओं को बाट देता है।

इसी
बात को ध्यान में रखकर स्ट्राईकर नाम की एक फिल्म बाज़ार में उतरी है जिसमे खेल के माध्यम से किसी रोज़मर्रा, जीवन और अस्तितव के कई रूपक देखने को मिले।
बात करते है स्ट्राईकर की जिसकी भूमिका समाज मे कई रूपों मे देखी जा सकती है-

किसी
सोच को आगे धकेलने की भावना लिए जिसमें वास्तविक रूप से आपका अपना रूझान और विश्वास नज़र अता है। बहस और इज़जत को एक-साथ जीते लोग अकसर इस स्ट्राईकर से खेलते नज़र आते है और ये खेल कई हद तक भावनात्मक रूप से हमको लालसा और मज़े के हवाले देता है।
जिसमें लिपटा हर एक पल कई रचनात्मक सोच को माहौल की बुनाई में रखता चला जाता है और जगह को, चहरों को, आते-जातों को मुस्कुराने के कई लम्हें दे जाता है।


सैफू.