Night show.


ये बात तो अब रोज़ रात होते ही शुरू हो जाती है. कौन समझाए ? कौन कहे इनसे कि आस-पास बहु-बेटियों का घर है ?

यहाँ तो कोई कहने-सुनने सुनने वाला ही नहीं है, रोज़ाना मजमा लगवाना इस आदमी का काम बन गया है.
शीतल जी के घर के नीचे रोज़ पड़ोस के रमेश भाई पीकर हल्ला मचाते हैं, रत के ९ बजे नहीं के शीतल जी का अपने घर की गेलरी से इस तरह का बडबडाना शुरू हो जाता है.

रमेश भाई रोज़ एक ही बात बोल-बोलकर इलाका सर पर उठा लेते हैं- उनकी कोई एक बात नहीं सुनता लेकिन शीतल जी की बात को सुनने के लिए पूरा इलाका इकठ्ठा हो जाता है.

रमेश भाई --- तुम सब मुझे यहाँ से भागना चाहते हो , मैं यहाँ से कही नहीं जाने वाला...
शीतल जी --- जा अपने घर जा, कोई नहीं भगा रहा तुझे- अपने घर जा सोने दे हमे, हम रोज़ यहाँ तेरी गलियां सुनने नहीं बैठे है.
( वो रोज़ाना यही सोचती हैं कि वो न बोले, लेकिन अब उनको भी आदत सी हो गयी रमेश भाई की तरह रोज़ इलाके को अपनी आवाज़ सुनाने की )

रमेश भाई --- हाँ तो भगा दो मुझे, मरो मुझे, ये सब मरने के लिए तो आये है , मरो ....भगाओ
शीतल जी --- चला जा, जा- वरना ये सब ही मरेंगे, फजूल में गलियां मत बका कर यहाँ आकर, ये अपने घर जा कर किया कर, मैं भी तो देखू तेरी बीवी कैसे सुनती है तुझे ?

पूरा इलाका इनकी इस बातचीत को इतने ध्यान से सुनता है जैसे कोई फिल्म चल रही हो- वैसे ये नाईट शो सही टाईम पर ही तो शुरू होता है 9 से 12 .

इस भीड़ में आस-पास के वो सभी लड़के शामिल होतें हैं जिनका काम ही है रात की आवाजों को सुनना और अपनी खिल्लियों से माहोल में गूँज बनाये रखना जिससे की इनकी मोजूदगी का एहसास बना रहे उस जगह में. वो अपनी बैठक जान-बूझ कर ऐसी जगह बनाते है जहाँ से उनकी बातें और हरकतें इलाके के बीच पहुच सकें.

जब भी इस तरह की कोई बातचीत इलाके में भारी आवाज़ बनकर गूंजने लगती है तो आस-पास के घरों की गेलरियों में लड़कियों का आना होता है जिससे ऊपर-नीचे के बीच देखा-देखी का रिश्ता जोर पकड़ता है और इशारेबाज़ी, अपनी पसंद , दोस्तों के लिए भाभी चुनना एक तरह से एक अलग ही समझ बनता है इस माहोल को सोचने के लिए की इस दोरान वो क्या-क्या है जो चल रहा है होता है, लडाई सिर्फ हक और नाहक में फस कर रह जाती है उसके बीच लुक्का-छुप्पी का वो जो खेल है वो एक मोका बन जाता है लड़के-लड़कियों के लिए जिसके बार-बार बनने का इंतज़ार रहता है.

रमेश भाई पीने के बाद एक ही बात सोचते हैं की ये सब मुझे भागना चाहते है, मरना चाहते हैं. ऐसा इसलिए होता है की जब भी वो पीकर कालोनी में इंटर होते हैं तो वो सीधे अपने घर नहीं जाते बल्कि गालियाँ बकते-बकते बिल्डिंग के नीचे ही मंडराते रहते हैं. ऐसे हालातों में उनके दिमाग को कोई भी बात मिलना- हल्ला मचने का मुद्दा बन जाता है.

लड़के अकसर उनसे ये कह देतें हैं कि --- रमेश भाई तुम्हारा पत्ता तो साफ़ है ... ये सब मिलकर तुम्हे भागने कि साजिश कर रहे हैं .
बस ये सुनते है उनकी शराबी धुन शुरू, नशे की हालत में गिरते-पड़ते वो अपना रूप धारण कर इलाका सर पर उठाने का जिम्मा ले लेते हैं.

ऐसे में उनका चिल्लाना शुरू और शीतल जी का उन्हें समझाना शुरू, न वो समझते हैं और न ही कोई उन्हें समझा पता है बात यही पर आकर शुरू भी होती है और ख़त्म भी यही होती है कि--- तुम सब मुझे यहाँ से भगाना चाहते हो ....

saifu...

आंतरिक उर्जा


"खुद को अकेला समझना सरासर ना इंसाफी है"

ये लाईन मैंने अपने साथियों के साथ समझी, जब मैंने ये लाइन सुनी तो मुझे इसे समझने मे ज्यादा देर नही लगी क्योंकि इस लाइन को हम अपनी जीवन में कई कठिन प्ररिस्तिथियों में जीते हैं।

इस बात को समझने के बाद मैंने हमेशा इसे अपने आप से जोड़े रखा, क्योंकि ये लाइन मेरी आंरिक उर्जा मे एक खास तरह का बहाव पेदा कर देती है। जिससे मुझे कर जाने की क्षमता का एहसास होता है।

अकसर कुछ प्रसतिथियां इस कदर घैर लेती हैं कि हम खुद से एक बहस मे जुट जाते हैं और ऐसे हालात मे एक बात साफ साफ समझ आने लगती है कि जिस पर जितने संकट मंडराते हैं वो उतना ही सतर्क और आंतरिक उर्जा का धनी हो जाता है।

वो कहते हैना :- दूध का जला छाज भी फूक-फूक कर पीता है।


एसे मे खुद को समभालना भी मुझे अपनी आंतरिक उर्जा का बल लगता है। जिससे मुझे समस्याओं से लड़ने और उन्हें समझने का भरपूर दम मिल जाता है।

कई लोग समस्याओं के दौर मे प्रार्थना करते हैं और खुद को मजबूत करते हैं, प्रार्थना करने का मतलब है खुद को कमज़ोर समझना लेकिन अगर संकट से जूझा जाए तो हमारे अंदर की आंतरिक उर्जा का बल कई गुना बड़ जाता है।

जिसकी वजह से हमे डर नही लगता और डर ना लगने का मतलब है, हम खुद के दम से किसी भी और कैसी भी समस्याओं, चुनोतियों का सामना करने को तैयार हैं।

हालात शब्द से सभी का सामना होता है, किसी का खुशी में तो किसी का गम में, हालात हर किसी को खुद के होने का एहसास कराता रेहता है लेकिन हम उसे अकसर अपनी ज़ुबा पर तब लाते हैं जब हालात ही कुछ एसे हो- मतलब परेशानियों के समय में।

हमे मुकाम कब मिलता है ?

जब हम अपने अंदर की ताकत और जुझारुपन को सामने लाते है या बाहर लाते है।

इस बात को समझने का एक और नज़रिया हो सकता है- कि जीवन के लिए जो जद्दोजहद आदमी करता है वही हमारी आंतरिक उर्जा को मनोबल देता है।

और इसे हम प्रतिरोधक क्षमता भी कह सकते हैं जो जीवन के लिए किये गऐ संघर्ष से आती है।

जब किसी पर संकट आता है तो वो रास्ते तलाशता है।

शेर पीछे पड़ जाए तो हिरन भागने की कोशिश करता है और इसी तरह हम पर भी जब समस्याऐं आती हैं तो हम बचने की कोशिश करते है।

एसे हालात हमारी अंदरुनी चैतना को दिखाते हैं और जब संकट घैर लेते हैं तो हमारी चैतना ही हमें प्रस्तिथियों से लड़ने को उत्साहित करती है।

और इस बात को हम खुद से महसूस कर सकते हैं कि संकटों मे ही हमारी आंतरिक उर्जा पोषित होती है।

सफ़र पटियाली ,

आस-पास का माहौल...


अकसर मैं अपना कुछ समय पटियाली चौराहे की चाय की दुकान पर बैठकर गुज़ारता हूँ और हमेशा की तरह वो समय रात का ही होता है 6 से 8 के बीच का जिसमे में खुद को लोगों के बीच रख पाने का समय निकाल लेता हू एसे मे तरह-तरह के लोगों से और उनके अपनी जगह को देखने के नज़रियों से मैं मुखातिब होता रहता हूँ जिससे मुझे जगह में कब, कहाँ और कैसे पैश आना है ये समझ बनती रहती है हर किसी की बात में एक नई सीख और सलाह का एतराम करना बखुबी दिमाग में बैठ जाता है और हँसने-हँसाने के साथ-साथ जगह से जुड़े किस्से और पहेलियाँ सुनने को मिलती है, एसा लगता है जैसे यहां का माहौल मुझे खुद के साथ जोड़ने की कोशिश कर रहा हो। चाय की दुकान का माहौल यहां के सबसे भरे हुए माहौल मे से एक है जहां तरह-तरह के लोग अपनी डेरी जमा लेते है रात के समय मे चाय की दुकान पर ही सबसे ज़्यादा रोनक देखने को मिलती है सबसे ज़्यादा रोनक का मतलब दुकान के बाहर लटका एक बेटरी से चलने वाला बल्ब जो और कही देखने को नही मिलता।


यहां रात भी तो जल्दी हो जाती है सिर्फ 7 बजे ही अंधेरा घर, गलियों, चौराहों पर अपना कब्ज़ा कर लेता है और लोग अंधेरे से चहरा छुपाए अपने-अपने घरों मे ही रहते है। जरूरत मंदो का घरों से बाहर निकलना मुनासिब है जिससे कि रात मे कोई चलता हुए दिखे तो दहशत का साया मन मे उतर आता है एसे मे या तो उलटे पैरो भागने का मन करता है या फिर अपने मन को हाथों की मुठ्ठियों मे दबाए- दुआ या राम-राम जपने का समय करीब आ जाता है।


चाय की दुकान ठीक उस जगह है जहां बसों के रुकने का ठिकाना है बस आती है रुकती है और 5 मिनट मे निकल जाती है उसके बाद घंटों का इंतज़ार क्योंकि यहां सफर की बहुत मारा-मारी है दिन में लोग यहां चलने वाली जीप गाड़ियों का सहारा लेकर अपने-अपने ठिकानों तक पहुच जाते हैं, जिसमे बहुत दिक्कत सहनी पड़ती है। यहां के अड्डे पर जीप गाड़ियां नम्बर से चलती हैं।


हर एक गाड़ी का नम्बर आता है और हर नम्बर के लिए गाड़ी को घंटो खड़ा रहना पड़ता है और जब उनका नम्बर आता है तो वो दिन की दिहाड़ी बनाने के लिए अपनी गाड़ी फुल करके चलते हैं और फुल ही नही बल्की ‌‌‌‍‌ओवर लोड करके चलते हैं। जीप के मिताबिक उसमे ज़्यादा से ज़्यादा 8 सवारी और एक ड्राइवर बैठ सकता है लेकिन यहां की जीप में जब तक 18 से 20 सवारी चड़ नही जाती वो आगे नही बढ़ती क्योंकि यहां बैठकर सफर करने का नियम नही है यहां फंसकर, खिसककर, लटककर छतों पर चड़कर सफर करने का नियम लागू है। एसा नही है कि इस सफर से लोग सहमत हैं, यहां आए दिन खिसयाते लोग ड्राइवर पर चड़ जाते है लेकिन ड्राइवर भी अपनी लाचारी सुना कर इस बहस से कट जाता है ( भाई गाड़ी चलेगी लेकिन जब तक हिसाब नही बनेगा कैसे चलाऊ, डिज़ल के पैसे, रोड के ठेके के पैसे और अपनी दिहाड़ी जब तक नही बनेगी मैं गाड़ी चलाकर क्या करूंगा, अगर किसी को जल्दी हो रही हो तो वो उतर सकता है)


यहां सफर तय करने के लिए इंतज़ार करना बैकार है क्योंकि यही एक मात्र साधन है 15-16 कि.मि का रास्ता तय करने का। अकसर लोग किलस कर उतर जाते हैं और आती-जाती गाड़ियों को हाथ देकर रोकने की कोशिश करते हैं कोई ट्रक-टेम्पों दिख जाता है तो उस पर जैसे-तैसे चड़ने का इरादा बना लेते हैं क्योंकि यहा कोई भी गाड़ी रुकने को तैय्यार नही होती क्योंकि उन्हें मालूम होता है कि ये सवारी इस ठेके की है यहां गाड़ी रोकी तो ठेके के मालिक से हातापाई तक हो सकती है।


एसे में सवारी के पास कोई और रास्ता नही बचता और घिच-पिच करती इस जीप में ही सफर करना पड़ता है। मेरे साथ ये रोज़ का किस्सा है सुबह जीप की छत पर बैठकर ओफिस पहुचना और रात को टाइम से बस को पकड़ना वरना आने का कोई साधन नही है क्योंकि रात मे कोई जीप या ट्रक-टेम्पों नही चलते। पटियाली चौक पर बसें रुकने का समय – सुबह 9 बजे लोहारी खेड़ा वाली, दोपहर 2 बजे अली गंज वाली, शाम 7.30 बजे शिवारा वाली,और रात 8.30 बजे भरगैन वाली आखरी, ये सब दिशाए पटियाली से होकर गुज़रती हैं। मुझे शाम वाली गाड़ी से निकलना होता है क्योंकि उसके बाद पटियाली में वक़्त गुज़ारना बहुत मुश्किल है सड़कों पर लोग नही दिखते, बाज़ार मे भीड़ नही दिखती, चारों तरफ बस अंधेरा और उस अंधेरे मे टिम-टिमाता चाय वाले का बेटरी बल्ब और पास खड़ी एक अन्डे आमलेट वाले की रेड़ी जो उसी बल्ब के सहारे उस अंधयारी सड़क पर खड़ा है, कोई एक-आद ग्राहक आता ही रहता है जिससे उसकी कुछ घंटे खड़े रहने की हिम्मत बनी रहती है।


जैसे ही गिनती-चुनती के लोग भी घरों की तरह रूख कर लेते है वैसे ही सिमटने का दौर शुरू हो जाता है 9 साडे 9 आखरी टाइम माना जाता है जिस वक़्त कोई भी दिखाई नही देता ना लोग और ना वो टिम-टिमाता बल्ब आखिर बैटरी भी कब तक बल्ब जलाएगी वो भी कुछ घंटो तक अंधेरे से कुछ लोगों को बचाती है उसके बाद अंधेरा उसे भी अपनी चपेट मे ले सो जाता है सब के साथ।


सबके सो जाने के बाद इलाके मे लाइट आती है ठीक रात 11 बजे गिने-चुने लोगों के घरों से टि.वी चलने की आवाज़ों से ये महसूस होता है कि ये इंतज़ार में थे खुद को बोरियत से बाहर लाने के लिए क्योंकि अंधेरा सिर्फ डर ही ही नही होता। कुछ लोग अंधेरे मे खुद को उतार लेते है और सामना करते है उस ओझलपन का जिसमे कुछ दिखाई नही देता जिसमे एक छवि दम से खड़ी होती है दोनो ही जीदार है और दोनों ही एक-दूसरे को डराने का दम रखते है जिसकी हिम्मत 11 बजे तक टिक जाए वो विजेता क्योंकि 11 बजे हर घर का एक बल्ब जरूर जलता है और हज़ारों बल्ब की रोशनी के आगे जो बचा वो सकून में।


सैफू .

दिल्ली में फ़ायरिंग, 'इंडियन मुजाहिदीन' की चेतावनी

घटनास्थल















भारत की राजधानी दिल्ली में अज्ञात बंदूकधारियों ने जामा मस्जिद के गेट नंबर तीन के बाहर पर्यटकों की एक बस पर गोलियाँ चलाई हैं जिसके कारण दो लोग घायल हो गए हैं. पुलिस के अनुसार सुबह लगभग साढ़े ग्यारह बजे इस इलाक़े में फ़ायरिंग हुई और फिर हमलावर मोटरसाइकिल पर फ़रार हो गए.

इस घटना के बाद, दोपहर में बीबीसी हिंदी को भेजे गए एक ई-मेल में ख़ुद को इंडियन मुजाहिदीन बताने वाले एक संगठन ने सीधे इस घटना का ज़िक्र किए बिना 'भारत प्रशासित कश्मीर में मारे जा रहे निर्दोष लोगों का हवाला देते हुए दिल्ली में राष्ट्रमंडल खेलों के बारे में चेतावनी दी है.'

"क्या कहना है प्रत्यक्षदर्शियों का"
गोलीबारी के दो घंटे बाद जामा मस्जिद से थोड़ी दूर एक पुलिस थाने के पास एक कार में भी आग लगी. बम निरोधक दस्ते ने जांच के बाद उसमें से एक प्रेशर कुकर जैसा सामान निकाला है लेकिन इसमें भी जान माल का कोई नुकसान नहीं हुआ है.

दिल्ली पुलिस के प्रवक्ता राजन भगत ने शाम को बीबीसी से बातचीत में कहा कि इस घटना में घायल दोनों विदेशी सैलानी अब ख़तरे से बाहर हैं.

राजन भगत ने इस घटना में किसी चरमपंथी संगठन का हाथ होने से इंकार करते हुए कहा कि ये किसी आपराधिक गुट का काम लगता है. उनका कहना था, '' ये पुलिस को निशाना बना रहे थे. किसी चरमपंथी संगठन का इसमें हाथ नहीं लगता है.''

इंडियन मुजाहिदीन का भेजा संदेश
घबराने की ज़रूरत नहीं: शीला दीक्षित
"एज़ वी ब्लीड सो विल यू सीप.....सावधान ये अल्लाह के शेरों की पहल है. हम आपको चेतावनी देते हैं कि यदि दम है तो आप कॉमनवेल्थ खेल आयोजित करके दिखाएँ. हमें पता है खेलों की तैयारियाँ चरम पर हैं. सावधान ! हम भी आश्चर्यचकित कर देने के लिए पूरी तैयारी कर रहे हैं..."


बीबीसी को भेजे ईमेल में जामा मस्ज़िद के पास हुई घटना का ज़िक्र किए बिना कहा गया है - "अल्लाह के नाम पर, हम ये हमला आतिफ़ अमीन, मोहम्मद साजिद को श्रद्धांजलि के रूप में पेश करते हैं..."

पाँच पन्ने के ई-मेल में कहा गया है - "एज़ वी ब्लीड सो विल यू सीप.....सावधान ये अल्लाह के शेरों की पहल है. हम आपको चेतावनी देते हैं कि यदि दम है तो आप कॉमनवेल्थ खेल आयोजित करके दिखाएँ. हमें पता है खेलों की तैयारियाँ चरम पर हैं. सावधान ! हम भी आश्चर्यचकित कर देने के लिए पूरी तैयारी कर रहे हैं...."

ग़ौरतलब है कि दिल्ली में दो हफ़्ते बाद राष्ट्रमंडल खेल शुरु हो रहे हैं और राजधानी में अनेक विदेशी नागरिकों के पहुँचने की संभावना है.
इस घटना के बाद दिल्ली में तनाव फैल गया है और मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने लोगों से शांत रहने की सलाह दी है. दिल्ली और मुंबई महानगरों में हाई एलर्ट की घोषमा कर दी गई है.

जो लोग घायल हुए हैं वे दोनों ताईवान के नागरिक हैं. वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में भर्ती हैं और ख़तरे से बाहर हैं. गृह मंत्रालय और सुरक्षा बल सतर्क हैं और पूरे मामले की जाँच चल रही है. लोगों को घबराने की ज़रूरत नहीं है, सुरक्षा व्यवस्था और कड़ी की जा रही है
"मुख्यमंत्री शीला दीक्षित"

फ़िलहाल दिल्ली के प्रशासन और पुलिस ने ये स्पष्ट नहीं किया है कि ये चरमपंथी घटना है या नहीं. दिल्ली पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने फ़िलहाल इस घटना के किसी तरह के चरमपंथ से जुड़े होने की बात नहीं कही है.

दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने कहा है, "जो लोग घायल हुए हैं वे दोनों ताईवान के नागरिक हैं. वे लोकनायक जयप्रकाश नारायण अस्पताल में भर्ती हैं और ख़तरे से बाहर हैं. गृह मंत्रालय और सुरक्षा बल सतर्क हैं और पूरे मामले की जाँच चल रही है."

'राष्ट्रमंडल खेलों में सुरक्षा तगड़ी'

"संयुक्त पुलिस आयुक्त करनैल सिंह"
दिल्ली पुलिस के संयुक्त आयुक्त करनैल सिंह का कहना है, "मोटरसाइकिल पर सवार दो लोगों ने सात-आठ राऊंड फ़ायरिंग की है. इन्होंने रेन कोट पहन रखे थे. घटनास्थल से गोलियों के चार छर्रे बरामद हुए हैं. इस घटना में दो लोग घायल हुए हैं. मामले की जाँच चल रही है."

जामा मस्जिद के शाही इमाम बोखारी ने एक टीवी चैनल को बताया, "लगभग साढ़े ग्यारह बजे वे गेट नंबर तीन के दरवाज़े के बाहर थे जब मोटरसाइकिल पर सवार लंबे कद के दो नौजवानों ने स्टेन गन से फ़ायरिंग की. जब उन्हें एक व्यक्ति ने चुनौती दी और उनके पीछे भागा तब वे इलाक़े से भाग निकले."

http://www.bbc.co.uk/hindi/india/2010/09/100919_delhi_firing_as.shtml

एक नज़र

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गुज़ारू अपना आज किसी सपने में सजा कर
उतारू अपने आप को किसी आईने में बसा कर
निकलु मैं भी एक दिन उड़ने की तमन्ना लिए,
चलु मैं भी एक दिन खुद को भीड़ बता कर...

जिंदगी के लम्हातों से पूछु अपना हाल बे-हाल बता कर
सीखू उससे जीना सुर-ताल लगा कर.
सुनाऊ कोई सपना, अपना कोई पल छुपा कर,
और पूछु अपने कल से अपना कल बता कर.


सैफू


माफ़ी
चाहता हूँ दोस्तों इतने लम्बे समय तक आपसे दूर रहने के लिए.

इसकी एक ख़ास वजह है मैं उ.प में एक प्रोजेक्ट से जुदा हुआ हूँ जिसके लिए मुझे यही पर अपना समय देना पड़ता है, यहाँ पर मैं खुद की कोशिश से एक लैब बना रहा हूँ जिसमे लोकल लोगो की शिरकत से ही मैं जगह की बसावट में उतर सकता हूँ,
यंग राईटरस के साथ काम करना और उनकी उत्तेजनाओ को संभवता के पायेदान तक लाना मेरा काम है जिससे की वो अपने कल में आज के इस समय को दोहरा सके उनकी रचनाये उनको एक पहचान दे सके... कोशिश है समय को दोहराने की, बनने से बनाने तक को सोचने की वो ख़ास जगह जहा लड़के-लडकिया खुद से खेल पाए, सोच पाए उस खेलने को, लिख पाए उस सोचने को और दिखा पाए अपने लिखे हुए को समाज और शेहेर की घिच-पिच करती भीड़ में.
ये एक कोशिश है अपने साथ भी और जगह के साथ भी कि क्या कोई एसी जगह अपने रंग में लोगो को रंग सकती है ?
क्या सपनो को दीवार पर सजाया जा सकता है ?
क्या कल्पनाओ को बाज़ार में सुनाया जा सकता है ?
क्या खुद कि नज़र से देखे उन लम्हों को ओरों कि नजरों का हिस्सा बनाया जा सकता है ?

एसे कई सारे सुझाव और सवाल दिमाग में पहरे देते रहते है लेकिन उनको हकिकत की शक्ल देने में एक लम्बा समय चाहिए वो लम्बा समय बार बार ये एहसास दिलाता रहेगा की वक़्त के बदलते काटो के साथ अगर खुद को बदलने की ज़िद भी जुड़ जाये तो उन बदलते पलों में, मैं खुद को भी पाउँगा . और समय यही चाहता है की सबको उसकी रफ़्तार से चलना चाहिए जो छूट गया वो कल वापस नहीं आएगा और अगले कल में खुद को देखना आपको काफी पीछे छोड़ देता है.

लोग कहते है कछुए की चाल में आलस कम होता है तेज़ भागने से आप कही जाकर रुक जाते हो जहा जाकर आप पीछे छूटने लगते हो...
ये सोचने वाली बात है की जीवन रचना की रफ़्तार क्या होनी चाहिए ?
मुझे लगता है कि समय हर घडी हमे ये महसूस करता है कि हमे किस रफ़्तार से चलना चाहिए, हर मोड़ पर संभलने के संकेत देता नज़र आता है समय.
वक़्त-बे-वक़्त बनते किस्सों में आपको शामिल होने के न्योते देता है तो कभी पिछले किस्सों से मिली नसीहतो को सामने ले आता है और रफ़्तार पर असर छोड़ता है.

ये एक धारणा हम सबके दीमाग में रहती है शायद आपकी धारणा कुछ और हो लेकिन मेरी सोच और मेरे ख्यालात यही कहते है की हमे वक़्त की रफ़्तार से कुछ सीखना चाहिए उसकी गति धीमी ज़रूर है मगर बदलते समय में वो खुद को तरह-तरह से ढाल लेता है - जब लोग कहते है - "यार आज दिन का पता ही नहीं चला, कब खत्म हो गया" या "यार इतनी देर हो गई बेठे-बेठे लेकिन समय है कि कट ही नहीं रहा".
ये समय के अपने कुछ ढांचे है जो हमारे साथ तरह-तरह से जीते है लेकिन फिर भी लोग उसकी गति और बदलते रूप से कुछ सीच नहीं पाते, अपने बड़े-बुजरूगो से कहावत के नाम पर सीख का पाठ ज़रूर रट लेते है लेकिन समय के साथ चलना नहीं सीख पाते . शायद में भी आज ही इस गति को सोच रहा हूँ आज से पहले मैं भी इस रफ़्तार से ओझल था जो रोज़ मेरे साथ जीता है में उसी को नहीं सोच पा रहा था.

आगे से हम सब समय कि रफ़्तार को सोचेंगे और उसके साथ आगे बदने कि नीति को अपने जीवन में अपनाएंगे
हमेशा खुद को आगे के लिए तैयार करना है, हर बार आगे बड़ने को सोचना है जीवन भी आगे बाद रहा है समय भी आगे बाद रहा है तो हम क्यों ठहराव में जीए ये हमारी ज़िद होनी चाहिए तभी एक नया सपना पूरा होता दिखाई देगा ----



सैफू .

ढेरो गड्डे

वो पल जो वक्त की रफतार को पकड़ने की कोशिश में उसे तेज़ कर खो बेठता है अपने अतित को। तलाश जो अपनी दिनचर्या में खुद की मैं गाथा को कही अंधियारे कमरे में ओझल करती जाती है। मगर हम फिर भी अपनी वो खुदाई खत्म नही करते इस उम्मीद मे की हो सकता है जीत जाऊ ? कही ना कही उस अनमोल खज़ाने की तलाश में लगे रहते है और ढेरो गड्डे खोदते चले जाते है अपने सफर को इतिहासिक बानाने की कोशिश में।

एसा लगता है कि एक चिरग की रोशनी दूर से सब साफ दिखाने में सब मटमेला करती जा रही है । उस में भी आँखे तलाश रही है अपनी दूरी के सफर को जो कही छोटा होने के बावज़ूद भी बहूत लम्बा लग रहा है ।

ना जाने कितनी परछाईयो को पार करना पड़ता है ।और कितनी अनदेखी अफवाऔ को मानना पड़ता है । क्योकि सफर हर बार मिलता है एक नई छवी के साथ जो उसे छिलती नोचती और पी जाती । पर पीना भी अधुरा होता क्योकि कुछ ना कुछ झुटन तो बच ही जाता है।वो ही झुटन किसी मेजिक बॉक्स की तरहा फिर भर जाता जो परोसा जाता किसी नए के सामने अपने नए स्वाद के साथ। फिर क्या ? लग जाते है इसे एतिहासिक बनाने में। सब कुछ ओखली में ड़ाल कुटने लगते है एक नए मिक्शचर की उम्मीद के लिए।

फिर भी याद आता है अपनी दुरीयो का नापा वक्त जो अपने बने ढाचो में कही छिपा हमे ही तकता रहता है। वो दिवार पर लगी घड़ी जो अपनी दूरी को नापने के लिए सब गिनती जाती है ओर अपनी धड़कन से अपने होने की मोज़ूदगी का एहसास दिलाती। और कहती कितने दिन हुए । चलो आज फिर साथ मिलकर अपनी बातो में मुझे खोने दो ।

वो चाय के खाली गिलास आज भी इसी उम्मीद में रखे दिखाई देते है कि आज तो कोई मण्डली हमारे साथ अपने सफर को बाँटे और हमारी गरमाई में इस गर्म माहोल में मिठास मिलाए। पर वो मिलना भी उसे पता है बटना ही था तभी खामोश होकर उन बिखरे दानो को बस देखने का ही काम करते। आज वो सफर मे तय हुआ वक्त धुंधला है या गायब पता नही। पर कुछ है जिसकी उम्मीद है।

पता नही क्यो हम अपनो से ही कटने लगते है। अगर पुछो तो कभी समय नही मिलता कहते है या काम में व्यस्त है कहकर अपना रास्ता नाप लेते है सफर के रास्तो में उन को धुंधला करते चले जाते है । फिर भी तैयार रहता है अपना एतिहासिक पन्ना हर किसी को सुनाने के लिये ।

कभी-कभी हम खुद को इतना ज़ाहिर कर देते है कि किसी ओर की मोज़ूदगी भी हमे फीकी सी लगती है। फिर निकलते है हम अपने सफर की तलाश में। वो ही सफर हमारे लिए एक सवाल बना रहता है। कि किस सफर को हम तलाश रहे है ? वो सफर क्या है- जो हमारी रोजर्मरा की जिन्दगी में अपने होने की छाप छोड़ जाए और आए दिन अपने होने को हमारे लफ़्जो के साथ हमारे अपनो में बोंते
मनोज