Delhi-06

दिल्ली 06 उन पहलूओं से बना हुआ है जो पल-पल हर एक नज़र में आपको एक नई भाषा देता है माहौल को बयां करने की, जिसमें टाइम-टेबल और सिमटते माहौल में भी एक-दूसरे को वो खुशी बांटते चहरें मिल जाते हैं जो इस दौर में कहीं गुम से लगते हैं।
पल-पल की कीमत होती है ये कहता है हमारा समाज, घर-परिवार, हमारा खुद पर हमारा खुद भी हमसे कुछ चाहता है और उसी चाहत में लिपटे लोग अपने खुद को महफिलों मे उतार आ मिलते हैं जिल्ली-06 की उन जगहों में जो कि कहीं देखने को नहीं मिलता। क्योंकि हर जगह अपना समाज खुद तैयार करती है और दिल्ली-06 का अपना खुद का समाज है तभी इसे पुरानी ज़ुबानों से लेकर आज तक पुरानी दिल्ली ही कहा जाता है जिसमें कहने-सुनने वालों की भाषा भी वही मांगता है जो उनका खुद चाहता है।

लोगों की चाहत से जगहों का बनना पुरानी दिल्ली की ख़ासियत है। जिसमें हर एक जगह अपने होने पर गर्व करती है और वहां से निकलती आवाज़े कहती हैं "हम अपने मालिक खुद हैं, कोई ओर कौन होता है हमें रोकने वाला" जिसमें कभी बड़े-बूड़े अपनी बहकती आवाज़ में कहते नज़र आते हैं
"पुरानी दिल्ली, दिल्ली का वो कोना है, जो दिल्ली को पहचान देता है।"
"यहां जैसा बाज़ार और महफिलें ओर कहां?”
"दिल्ली बदल रही है पर पुरानी दिल्ली जो थी वो है और अल्लाह ने चाहा तो ऐसी ही रहेगी"

तो कभी घूमते चहरे, आवाज़ें लगाते बैझिझक लोग माहौल को बदलाव के भाव में उतारते से लगते हैं। जिसमें कभी चाय के ठिए शामिल हो जाते हैं तो कभी रेढ़ियों पर लगा फल-फ्रूट का मेला जो रोज़ की रोनक है। कभी ओरों की चाहत को अपनी दुकान मे सजा लोग खेंचते नज़र आते हैं लोगों को तो कभी लड़ाई झगड़ो से शांत सी दिखती गलियाँ, चौराहें और बाज़ार।

बाहर दिखता है वो जो सुनने में आता है पर इसके अंदर अपनी चाहतों के दरवाजों को कोई खोले बैठा है।
हर एक गली, हर एक मोड़ और चौराहा उसमें रहने वालों की मांग और चाहत की समझ से बनाए बैठा है वो महकमें जो टाइम-पास जैसी भाषा में अपने को वहां जमाए हुए हैं जिसमें उतरकर कई लोग जीते है, जिसमें जगह और लोग एक दूसरे की रोज़मर्रा को सजाते से लगते हैं।
कैरम क़्लब, चाय की दुकानें और ठिए, वीडियो गेम, जिम ऐसे कई महकमें अपनी अपनी परिभाषा लिए पुरानी दिल्ली मे उसी के टाइम-टेबल के अनुसार अपनी व्यवस्था और बनावट में हैं।

सैफू.

इस बनने की शुरूआत कैसे हुई?

राहों से अपनी पसन्द की चिज़ों को चुनकर इकठ्ठा करना और अपना घर तैयार करना।
यही तरीका है केरम क्लब के बनने का जिसमें क्लब का मालिक अपनी मर्ज़ी से क्लब को किसी तैय्यारी में सजाता है।

पसन्द न पसन्द आर्कषण के मुताबिक माहौलों को देखकर तैयार करता। जहाँ माहौल टाईम-पास होने का या करने का समय नहीं देता वहाँ केरम जैसे टाईम-पास खेलों को जगह मिल जाती है। जिसमें महफिल बनती, जुड़ती, संवर कर अपना खेल पैना करती नज़र आती है। खेल को पैना करना और उस खेल को बनाए रखने की होड़ में महफिलें इन जगहों को अपनी रोज़मर्रा में जोड़ लेती है।
एक केरम क्लब अपनी लम्बाई-चौड़ाई को जब तक लोगों की मौजूदगी से भर नहीं लेता तब तक कैरम क्लब खाली सा लगता है पर जब भीड़ होती है तो जगह का मालिक अपनी बनावटी दुनिया से खुश हो जाता है।

दो कैरम बोर्डो का यह महकमा सिमटता और अपने में सबको समेटता सा लगता है।
पर सब भूल लोग अपने हुनर को दिखाने में लग जाते हैं जिसमें से अनेक परछाईयाँ अपना प्रतिबिम्ब छोड़ चली जाती हैं। जिनकी छोड़ी गई धूल हर कोने में लगी दिखती है। वो कोना उनकी याद के साथ तैयार हो कर कुछ पलों को याद करने का रुप बन जाता है।
हर किसी के पास अपने समय का चक़्कर अपने हाथ की उंगलियों पर गढ़ा है। जिसमें से हर उंगली अपनी एक प्रतिक्रिया में मशरुफ़ नज़र आती है। जिसके खाली स्पेस में केरम जेसा खेल अपना भराव बनाए हुए है।

जगहें ...

कई जगहें हमें अपने आप मे सिमटने और बहने के बहाने देती हैं, वो बहाने जो कभी हमारी आदत में शामिल हो जाते हैं तो कभी रोज़मर्रा की रूटीन में अपनी एक जगह बना लेते हैं। और उनका ये जगह बनाना हमें उस पर सोचने और बोलने के कई तरीके दे जाते हैं, वो तरीके जो कभी हम दोस्तों की मण्डलियों में बोलते नज़र आते हैं तो कभी किताबों मे लिखते।

क्योंकि हर जगह पहले वक़्त मांगती है फिर आपकी आदत और फिर उसके तरीकों की एक समझ कि यहां कब, कैसे और क्यूं?
और वहीं समझ हमारे शब्दों में उस जगह के लिए एक शब्द और जोड़ देती है, कभी
वाह-वाह में तो कभी टाइम-पास में कभी मस्ती में तो कभी दोस्ती और आदत में।
जगहें अपनी समझ, अपनी बातें, अपनी अच्छाई और बुराई सब को अपने ही शब्दों में समेटे रखती है। और उसका ये समेटना जगह को बढ़ोतरी के पाएदान पर चढ़ा देता है।

क्योकि यहां आने-जाने वालों की कमी को महसूस नहीं किया जाता जिसमे बाहर से आ रहे शब्द जो बाहर के ही रहते हैं और अंदर बोले जाने वाली बोली जो सिर्फ वहीं की हैं, उस जगह को एक अलग ही जगह बना देती है।

किसी को यहां आना अच्छा लगता है तो किसी ने अपने जीवन के 10-12 साल के कई घंटे यहां दिये हैं, कोई यहां चैम्पीयन है तो कोई सिखना चाहता है, कोई रोज़ की चाय का शौकिन है तो कोई ठियों पर खड़े होकर चाय पीने को ही मज़ेदारी मानता है। सब अपनी ही धुन में है पर ये धुन सिर्फ लड़कों तक ही सीमित है अब वो चाय के ठियें हो या दुकान, कैरम क़्लब हो या वीडियो गैम की दुकान या फिर जिम....

सब अपने-अपने तरोकों से जगह से जुड़ते हैं उसे अपनाते हैं, उठते-बैठते हैं, मज़े करते हैं, खेलते हैं या खड़े होते हैं सबको अपनी जगह, मिलने वाला माहौल और आदत या शौक़ से लगाव है जो कि उस जगह से जुड़ा है।


सैफू...

बनने- बनाने के बीच में...

कुछ जगहें जो अपनी और दूसरों की संतुष्टि को पूर्ण करने की इच्छा ज़ाहिर करती रहती हैं। कुछ अनमोल ठिकाने जो बहुमूल्य कामों से भी ज़्यादा महत्वपूर्ण लगने लगते हैं। उसी में बैठे लोग अपनी खांचेदार ज़िन्दगी को जोड़ते जाते हैं, अपनी जरुरतों, कामों और महफिलों को जमाने में इच्छुक लोग घूमते, बनाते चलते हैं अपनी मनचाही जगाहों को।
यह लोग वो होते हैं जो छाल नुमा ज़िन्दगी को जीते जाते हैं और हर वाद-अपवाद को अपने शरीर से दूर कर नई छाल की बुनाई में लग जाते हैं।

फिर शुरु होती है समुह गढ़ने की एक अनुठी प्रतिक्रिया। जिसमें अवज्ञा और अनादर को दूर हटाकर अपने बनाए कस्बों मे विलीन होने की शक्ति होती हैं। वो कस्बें जो अन्नत में खत्म होते और फिर अपने प्रतिबिन्द की तरह ही बनते जाते हैं।
इसमे प्रकाश और अंधकार दोनों ही इन कस्बों को बनाने और बिगाड़ने में निपुर्ण है।
प्रकाश जो कि महफिल की रोनक में सब दिखाता है, सच हो या झूट। पर अंधकार अपनी चपेट में सब को लेकर विलीन होने की कंगार पर नज़र आता हैं।

इसमे सर्वदा अपना पाठ लिए घूम रहा हैं, जो टाईम-टेबल के हिसाब से आपको अपनी रुटीन में घूमाता रहता है। वो नवीन इच्छाओं को गाठ-व-गाठ बांधकर एक जालीदार ढ़ांचा तैयार करता है।
उसे आप ओढ़ कुछ हदतक लोगों की छायादार वाणी से बच पाते हो। मगर आप अंजान नहीं हो, क्योंकि जालीदार ढ़ांचे की वजह से आप अपने कुल में हो रहे संवाद को परखते और जोड़ते चलते हो...


...मनोज...

" भाई ताब का कैरम क्लब "

पुरानी दिल्ली की रंग वाली गली में।

यहां लोगों के आने के कई तरीके है मतलब सबके अपने-अपने मतलब जुड़े हैं इस जगह से। यहां कोई खेलने आता है तो कोई देखने, कोई मज़ाक करने तो कोई खेल की भावना में मगन चैलेन्ज देता हुआ पर जब यहां की भीड़ अपने रंग में होती है तो पुराने खिलाड़ियों की वही मण्डलियां जो ऊच-नीच को शर्तो के बल पर तय करतीं हैं। जो कहती हैं
"है दम तो जीत के दिखा पर शर्त लगा कर" उस वक्त खेल पर खिलाड़ियों का पैसा भी लगा होता है और इज्ज़त भी, इज्ज़त तो दूसरी निकली आवाज़ से वापस भी आ सकती है पर यहां पैसों का जेब बदलना चलता रहता है। जिसमें लगता है कि यहां हर कोई अपना रुतबा तय करने की होड़ में है, ऐसे में ये देखते चहरे कि "कौन जीतेगा" बड़े उत्साहित रहते हैं कि किसने, कब, क्या गलती की और वो अगली टन आने पर क्या कर सकता है, ये वहां खड़े बाकी लोग अनुमान लगाते और कुछ-कुछ बोलते नज़र आते।
यहां शर्तों के दाम 200 से 500 तक का सफर तय कर लेते हैं सिर्फ अपने अनुभव की बहस पर। बिना बहस तो कोई यहां 100-50 की भी शर्त नही लगाता।
पर बिना शर्तों में हार-जीत का मज़ा लेते कई लोग जगह में खेल देखने और खेलने का आकर्षण बन जाते हैं शुरुआती या कभी-कबार दिखते चहरों के लिए।


...सैफू...

" रहीस रॉकेट "

हर किसी माहौल में मिलावटी दुनिया की कल्पना करना और अपने आपसी सुझावों को सुलझाने की एक क्रिया जिसकी मौजूदगी हर बार, बार-बार महसूस होती है इस जगह में। हर कोई लड़ता, भागता, सिमटता नज़र आता है। अंकुरों की फुटकान के साथ जन्म लेते हैं निर्णय जिसे पनपने की एक जगह के रूप में संजोए रखने की कोशिश करती है यह जगह। कितनी जगहों के नेटवर्क को अपनी आपसी बातों में छोड़ जाते लोग, कुछ पाते कुछ खोते लोग, कभी समाचार केंद्र बन कर उभरते, कभी बातों-बातों में मदरसे की तालीम देते, कभी आपके और समाज के बनाए नियमों से लड़ते तो कभी सब आँखें मींच कर छोड़ देते समय पर और इन्तज़ार करते समय कटने का।
क़्लब, जिसकी लम्बाई-चौड़ाई लोगों के आगमन से सिमट सी गई है। दो बड़े कैरम से संजोया हुआ यह क़्लब 20 लोगों को अपने भीतर समेटने की क्षमता के साथ वहाँ अपना मुकाम जमाए खड़ा है।
रहीस नाम से जाना जाने वाला शख़्स चैम्प के ओहदे को समेट वहाँ अपनी मौज़ूदगी को रोज़मर्रा में बरकरार रख किसी के सामने खेलने बैठा है। जब उसका स्ट्राइकर गोटी से टकराता है तो गोटी रॉकेट की तरह अपना रास्ता बनाते हुए पॉकेट में चली जाती है। इसीलिए उसे रहीस रॉकेट के नाम से भी जाना जाता है।
हर मुलाक़ात में मेहमान और मेज़बान की भूमिका को निभाने की रीत छोड़ कर रहीस भाई अपने दोस्तों की मण्डली को महकाने और चमकाने का सारा बंदोबस्त अपनी दमदार आवाज़ के साथ तैयार कर इन रिश्तों की गाँठों को खोलते नज़र आते हैं। बड़ी आँखों के साथ खिलाड़ियों के जज़्बातों के साथ खेलने के अनुभव के कारण कभी तो हार जाते हैं तो कभी जीत कर बातों की लड़ियों को इकठ्ठा करके हारने वाले को जला-जला के भून डालते हैं।
ऐसी ही बातें जो बकवास या छोड़ू हैं वे इन्हें यहाँ का बकवासबाज़ी का बादशाह बनाए रखती हैं। इनका ज़ोरदार सलाम करने का अंदाज़ पूरे क़्लब का माहौल बदल देता है। ये अक्सर कुछ ऐसी बातें कहते रहते हैं जिसका किसी को पाता नहीं होता। इनका कहना है कि ये 17 साल की उम्र में दिल्ली चैम्प का ख़िताब हासिल कर चुके हैं, लेकिन इनकी छवि को देखकर तो नहीं लगता कि इन्होंने कभी चैम्प के ओहदे को स्वीकारा है पर खेल और खेल में निशानेबाज़ी इनको वहाँ का चैम्प बनाए रखती है। इनकी अदाएँ लोगों को सर फोड़ने और विवश होने पर मज़बूर कर देती हैं। लोगों का इनकी बातों को सुन हँस-हँसकर पेट में दर्द हो जाता है।
इस हल्ला-गुल्ला वाले माहौल में एक समय ऐसा भी आता है जिसमें सबकुछ शांत हो जाता है। वो मग़रिब की अज़ान का वक़्त होता है जिसमें सभी लोग चुप हो जाते हैं। गेम खेलना और पंखा बन्द कर दिया जाता है। वहाँ बैठे चहरे एक-दूसरे के चहरे के चुप होने के इंतज़ार में लगे दिखाई देते हैं।


...मनोज...

नज़रों से...

वो हमारी कालोनी में ही मंदिर के पास बने एक छोटे से कमरे में रहता है। उसका वो छोटा सा कमरा किसी इलेक्ट्रॉनिक कबाड़खाने से कम नहीं। उसने अपने कमरे में अपना एक कोना बना रखा है। चारदीवारी के बीच हर एक कोने में फैले पुराने रेडियो, घड़ियाँ, घंटे, अलार्म, कैमरे, पुराने वायर - कुछ ठीक तो कुछ ख़राब, जगह-जगह फैले खुले रेडियो के पुर्ज़े और उसके काम को अंजाम देने वाला हर वो सामान खुला पड़ा था, बिना किसी बॉक्स के।
उसकी इस चारदीवारी में कोई आलमारी नहीं है, बस एक टेबल है जो कोने में न होकर भी कोने में है। उस पर रखा था एक14 इंची टी.वी., जिसकी बंद मौजूदगी से मेरे दिमाग में यही चल रहा था कि "क्या ये टी.वी. ठीक होगा?" पर बात तो उस शख़्स की है जो 5फुट4-5 इंच का होगा। आँखों में हमेशा मेहनती नमी और कपड़े ज़्यादातर डार्क कलर के, चेहरा गोल और हाथों में ग्रीस जैसा कालापन - जो ये एहसास दिलाता है कि बन्दा मेहनती है।
वही कमरा उसके रहने की जगह है और वही खाने-पकाने की भी। वही उसका कारखाना है और वही चारदीवारी उसका माल इकठ्ठा करने का गोदाम।
वो हमेशा अपने कमरे में अकेला या दुकेला बैठा नज़र आता, कुछ न कुछ करता हुआ।
उसकी उम्र तो मुझे मालूम नहीं पर होगी यही कोई 30 के आस-पास की। वो अकेला ही रहता है। पता नहीं उसके माँ-बाप इस दुनिया में हैं भी या नहीं। आज तक मैंने उसे सिर्फ़ काम करते ही देखा है। कभी-कभार खाली दिखता है तो इतना खुश दिखता है मानो उसकी कोई लॉटरी लग गई हो। कभी उससे पूछने की हिम्मत नहीं हुई कि "भाई क्या हालचाल है?"
अक्सर वो बाहर नहीं दिखता। हाँ, कभी-कभी चाय पीने ज़रूर निकलता है। ऐसे में उससे मुलाक़ात होना मुश्किल सा था। पर कुछ वक़्त पहले उससे हुई एक मुलाक़ात ने मेरे कई सवालों की गुत्थी सुलझा दी, मसलन वो कितने समय से इस काम में अपने पैर जमाए हुए है? कबाड़ चुनने-खरीदने की नज़र उसने कितने समय में बनाई होगी? पुराना आलार्म कितने में खरीदता-बेचता होगा?
उसके कबाड़ को देखकर इस तरह के ढेरों सवाल मन में उठते थे पर एक सवाल का जवाब वो हर सण्डे कालोनी को देकर निकलता है कि उस कबाड़ का वो करता क्या है? दीवार घड़ियाँ, नये-पुराने रेडियो, ठीक चलती हुई हाथ घड़ियाँ, यहां तक कि वो कभी-कभी टी.वी. भी लेकर निकलता है। वो इतना सामान कबाड़ से कैसे ठीक कर लेता है?
सच में उसकी मेहनत या कहें उसके दिमाग का खेल है। वो जैसे ही एक बोरे में सारा सामान कंधे पर लादे कई गलियों से गुज़रता है, रास्ते में मिलने वाला शख़्स पूछने से नहीं चूकता-"आज कोई बढ़िया अलार्म है?”, “कोई अच्छी सी घड़ी है?”, "यार बोरा उतार, शायद कोई बढ़िया रेडियो मिल जाये?”
ऐसी लाइनों से होकर गुज़रता वो कई बार बोरे को कंधे से ऊपर -नीचे, उतारता-चढ़ाता, बाहर तक पहुँचता और किसी रिक्शे की ताक में खड़ा हो जाता।
जैसे ही कोई रिक्शा रुकता तो वो बोलता, "भाई चलना है इतवार बाज़ार"


...सैफ़ू...